Consumer Insights Report : शहरों में रहने वाले लोगों के लिए अचानक आने वाली मेडिकल इमरजेंसी आज पर्सनल लोन लेने की सबसे बड़ी वजह बनती जा रही है। इलाज का बढ़ता खर्च, हेल्थ इंश्योरेंस की सीमित पहुंच और सेविंग्स का दबाव, इन सबके बीच लोग मजबूरी में कर्ज का रास्ता चुन रहे हैं। एक ताजा रिपोर्ट के आंकड़े बता रहे हैं कि बड़े शहरों में यह समस्या और गहरी है, जहां इलाज महंगा होने के साथ-साथ लाइफस्टाइल से जुड़े खर्च भी तेजी से बढ़े हैं।
मेडिकल खर्च और कर्ज का बढ़ता रिश्ता
पैसाबाज़ार की कंज़्यूमर इनसाइट रिपोर्ट ‘द पर्सनल लोन स्टोरी’ के मुताबिक, भारत में 11 प्रतिशत लोगों ने मेडिकल इमरजेंसी और इलाज से जुड़े खर्चों के लिए पर्सनल लोन लिया। टियर-1 शहरों में यह आंकड़ा 14 फीसदी तक पहुंच गया, जबकि टियर-2 शहरों में 10 प्रतिशत और टियर-3 शहरों में 8 फीसदी उधार लेने वालों ने इसी वजह से लोन लिया। यह साफ संकेत है कि जैसे-जैसे शहर बड़े और महंगे होते जा रहे हैं, वैसे-वैसे बीमारी के इलाज की लागत भी लोगों को कर्ज में धकेल रही है।
हेल्थ इंश्योरेंस का कवरेज काफी नहीं
रिपोर्ट इस बात की ओर भी इशारा करती है कि देश में हेल्थ इंश्योरेंस का कवरेज अब भी काफी नहीं है। कई मामलों में बीमा या तो है ही नहीं, या फिर इतना नहीं है कि उससे पूरे इलाज का खर्च निकाला जा सके। ऐसे में अचानक अस्पताल में भर्ती होने की हालत में लोगों के सामने पर्सनल लोन लेना ही सबसे आसान विकल्प बच जाता है।
क्या बता रहे हैं 23 शहरों के हालात
यह रिपोर्ट भारत के 23 शहरों और कस्बों में 2,889 पर्सनल लोन लेने वालों के साथ डिटेल में बातचीत पर आधारित है। इसमें अलग-अलग इनकम ग्रुप यानी आय वर्ग, उम्र और शहरों के लोगों से बातचीत करके यह समझने की कोशिश की गई कि वे किन हालात में कर्ज लेते हैं और उनके फैसलों के पीछे क्या सोच काम करती है। रिपोर्ट बताती है कि मेडिकल जरूरतों के अलावा लोग रोजमर्रा के जरूरी खर्च पूरे करने, घर की जरूरी मरम्मत कराने और शादी या दूसरे पारिवारिक फंक्शन के लिए भी पर्सनल लोन लेते हैं।
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जरूरत, आकांक्षा और निवेश का बदला रिश्ता
रिपोर्ट से यह भी सामने आया है कि अब पर्सनल लोन लेना सिर्फ मजबूरी तक सीमित नहीं रह गया है। करीब आधे लोगों ने जरूरी खर्चों के लिए कर्ज लिया, लेकिन एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो अपनी इच्छाओं और बेहतर लाइफस्टाइल के लिए लोन का इस्तेमाल कर रहा है। इसके साथ ही कुछ लोग बिजनेस में निवेश के लिए भी पर्सनल लोन का सहारा ले रहे हैं। खास बात यह है कि नौकरीपेशा लोगों में भी अपने पारिवारिक बिजनेस, साइड बिज़नेस या पैशन प्रोजेक्ट के लिए लोन लेने का प्रचलन बढ़ा है।
मिडल इनकम ग्रुप यानी मध्यम आय वर्ग में यह रुझान सबसे ज्यादा दिखता है। सालाना 7.5 लाख से 10 लाख रुपये कमाने वाले लोगों में लाइफस्टाइल से जुड़े खर्चों के लिए लोन लेने की दर सबसे अधिक देखी गई है। वहीं टियर-3 शहरों में रहने वाले लोग अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए कर्ज लेने के मामले में टियर-1 शहरों के मुकाबले कहीं ज्यादा आगे हैं।
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सिर्फ ब्याज दर के आधार पर नहीं होते फैसले
पैसाबाज़ार की CEO संतोष अग्रवाल कहती हैं, “आज लोन लेने के फैसले सिर्फ ब्याज दरों या एलिजिबलिटी यानी पात्रता पर नहीं टिके हैं। जीवन की घटनाएं, आकांक्षाएं और तात्कालिक जरूरतें भी इसमें बड़ी भूमिका निभा रही हैं। यह रिपोर्ट ट्रांजैक्शनल डेटा से आगे बढ़कर उधार लेने वालों के व्यवहार और सोच को समझने की कोशिश है। बदलते कंज्यूमर बिहेवियर यानी उपभोक्ता व्यवहार के बीच पूरे क्रेडिट इकोसिस्टम के लिए जिम्मेदार, पारदर्शी और इंक्लूसिव लोन पहले से ज्यादा जरूरी हो गया है।”
प्रोसेस तेज हुई, लेकिन समझ अब भी अधूरी
रिपोर्ट बताती है कि ज्यादातर लोग लोन लेने के अनुभव से संतुष्ट हैं। ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों ही तरीकों से लोन अब जल्दी मिलने लगे हैं, जो कर्ज लेने वालों की राय में सबसे बड़ा फायदा है। इसके बाद आसान प्रॉसेस और कम दस्तावेजी जरूरतों को भी वे महत्व देते हैं। इससे साफ है कि लोग मुश्किल प्रक्रिया की जगह तेजी और सुविधा को प्राथमिकता दे रहे हैं।
हालांकि क्रेडिट की समझ अब भी अधूरी है। लगभग सभी लोग जानते हैं कि क्रेडिट स्कोर क्या होता है, लेकिन बहुत कम लोग समझते हैं कि यह स्कोर उनके लोन की मंजूरी और ब्याज दर पर किस ढंग से असर डाल सकता है। यही अधूरी जानकारी, खासकर युवा वर्ग में, कई बार जल्दबाजी में लिए गए गलत फैसलों की वजह बन जाती है।
