प्रताप भानु मेहता ने लिखा है- “राम, जिन्होंने कभी आपके नाम पर युद्ध शुरू किया वे अयोध्या में आज मंदिर को प्रतिष्ठित करेंगे। वे इसे भक्ति का सबसे बड़ा कर्म मानेंगे और इसे आपकी संप्रभुता के सम्मान के तौर पर पेश करेंगे। वे इसे रामराज्य की पुनर्चेतना करार देंगे और एक बर्बाद हुई संस्कृति को पुनर्जीवित करने की बात भी कहेंगे। लेकिन वहां (अयोध्या में) जो तैयार किया जा रहा है, वह हिंसक और सामूहिक अहंकार का स्मारक है।”
मेहता भगवान राम को ही आगे संबोधित करते हुए लेख में कहते हैं, “लेकिन मैं जानता हूं कि मुझे आप वहां नहीं मिलेंगे। क्योंकि वहां जो बनाया जा रहा है वह हिंसा और सामूहिक अहंकार का स्मारक है। आप जानते हैं कि आपके लिए एक मंदिर खतरनाक है। वाल्मिकी जी आपको इंसानी स्वरूप में नर चंद्रमा (पुरुषों में चांद) कह कर उल्लेखित करते हैं। आप बलिदान की पराकाष्ठा हैं। लेकिन हम नश्वर आपकी नैतिकता की पूजा नहीं कर सकते। यह बात अलग है कि आपके महान भक्तों में मधुसूदन सरस्वती, तुलसी और गांधी शामिल हैं, लेकिन उन्हें भी आपकी नैतिकता का पता लगाने के लिए कभी मंदिर की जरूरत नहीं पड़ी।”
प्रताप भानु मेहता कहते हैं- अयोध्या में आपको स्थापित कर वे आपको उन छवियों से अलग कर देना चाहते हैं, जिसके जरिए आप हमारे अंदर गढ़े हुए हैं। ऐसी छवि जिसे कोई भी आक्रमणकारी नष्ट नहीं कर पाया और न ही जिसे राजनीतिक मशीनरी एक टेफ्लान की मूर्ति बदल पाएगी। इसलिए एक मंदिर खतरनाक और गैरजरूरी है। आप जानते हैं कि इस मंदिर की स्थापना आतंकवाद के सदृश्य किए गए कामों से ही हो रही है, एक मस्जिद को गिराकर।
आप जानते हैं कि यह मंदिर धार्मिकता से नहीं बन रहा, बल्कि यह बदले का नतीजा है, वह भी उन घटनाओं के लिए जो सदियों पहले हुईं। पूर्व में आक्रमणकारियों ने कई मंदिरों को तबाह तबाह कर दिया और उन्होंने अयोध्या में भी मंदिर तबाह किए होंगे, लेकिन इतिहास एक बूचड़खाना है, जिसे कोई देवत्व से मुक्ति नहीं मिल सकती। हम सिर्फ यहां और वहां दुर्बल न्याय की कुछ छोटे-मोटे अंश छीन सकते हैं। यह सोचना हमारा अति-अभिमान होगा कि हमें आपको सुरक्षित रखना होगा।
वे कहेंगे कि राम राष्ट्रीय प्रतीक हैं। हिंदू गर्व का प्रतीक हैं। लेकिन क्या इसमें आपकी सहमति होती कि आपको नस्लीय राष्ट्रवाद से जुड़ा एक अत्यंत साधारण और कठोर प्रतीक बना दिया जाए? आपने जिन भक्तों के साथ गलत किया, न सिर्फ उन्हें बल्कि अपने विरोधियों को भी मुक्ति दिला दी। लेकिन यह मंदिर व्यक्तिरेक का स्मारक है।
मैं समझता हूं कि मेरे कई साथी इसे महान भाव-विरेचन की तरह लेंगे। लेकिन अंदर से हमें खुद से पूछना होगा- आखिर हममें इतनी असुरक्षा का भाव कैसे आ गया कि हमें एक स्मारक को गिराकर एक डरपोक जीत के जरिए अपने साझा अहंकार को संतृप्त करने की जरूरत पड़ गई? और यह ऐसी असुरक्षा है जो कभी तृप्त नहीं होती। यह तब तक बढ़ती रहती है, जब तक यह सभी भावनाओं को औपनिवेशिक नहीं बना लेती।
यह मंदिर राजनीतिक ताकतों द्वारा हिंदूवाद का पहला असल उपनिवेश है। मैं अपने आपको इस तरह बंधा महसूस कर रहा हूं, जैसा पहले कभी नहीं किया।
मेहता का लेख यह सोशल मीडिया पर खूब शेयर किया गया और लोगों ने इस पर तरह-तरह की राय दी। पूरा और मूल लेख आप यहां पढ़ सकते हैं।

