शशिप्रभा तिवारी

भारतीय शास्त्रीय नृत्य और संगीत की खूबी है कि यह विश्व संगीत के साथ बखूबी तालमेल बैठा लेता है। पंडित रविशंकर या जाकिर हुसैन या अदिति मंगलदास या संदीप दास जैसे कलाकार विदेशी कलाकारों के साज या नृत्य के साथ एक नए अंदाज में नजर आते हैं। इस खूबी को युवा कलाकार बहुत बेहतर समझ रहे हैं। क्योंकि हमारी शास्त्रीय परंपरा में कई बंदिशें हैं तो भी आवाजाही की पूरी संभावना रहती है। इसी के मद्देनजर त्रिवेणी सभागार में आयोजित समारोह में युवा नृत्यांगना अमीरा पाटनकर और शलाका रॉय ने नृत्य प्रस्तुत किया।

समारोह में गुरु शमा भाटे की शिष्या अमीरा पाटनकर ने कथक नृत्य पेश किया। उन्होंने राम वंदना से नृत्य आरंभ किया। उन्होंने शुद्ध नृत्य तीन ताल में पेश किया। थाट ‘ता-थेई-थेई-तत्’ में नायिका के खड़े होने के अंदाज को दर्शाया। उन्होंने आंखों व भौहों की गतियां, कलाई का घुमाव, हस्तकों को बरतने, सांसों की गति का प्रयोग बहुत सधे हुए ढंग से किया था। वहीं आमद ‘ता थेई तत् आ थेई तत’ चक्कर, उत्प्लावन और पलटों से युक्त था। जयपुर घराने की दर्जेदार परण, पंडित मोहन राव रचित परण और नटवरी को अमीरा ने विशेष तौर पर पेश किया। उन्होंने फर्रुखाबाद घराने की तिहाइयों को भी अपनी प्रस्तुति में शामिल किया। नृत्यांगना अमीरा पाटनकर के नृत्य में सहजता और तैयारी दोनों का समावेश नजर आया। उन्होंने परंपरागत सोच के साथ अपनी रचनात्मक सूझबूझ को भी अपनी प्रस्तुति का अंग बनाया, जो सराहनीय प्रयास था।

गुरु माधवी मुद्गल की शिष्या ओडिशी नृत्यांगना शलाका रॉय ने परंपरागत ओडिशी नृत्य पेश किया। शलाका प्रतिभा संपन्न नृत्यांगना है। वे एकल नृत्य के साथ-साथ अपनी गुरु के दल के साथ भी नृत्य पेश करती हैं। इस समारोह में शलाका ने जगन्नाथ अष्टकम पर आधारित मंगलाचरण से नृत्य शुरू किया। उनकी दूसरी पेशकश राग मालिका पल्लवी थी। इसकी नृत्य परिकल्पना गुरु माधवी मुद्गल और संगीत रचना पंडित मधुप मुद्गल ने की थी। अगली प्रस्तुति चंपू नृत्य थी। यह ‘ख’ वर्ण पर आधारित चंपू थी। कवि किशोरचंद्र नंद की इस रचना में राधा और कृष्ण के भावों का अभिनयन था। कृष्ण को पहली बार राधा मिलती है। इसके बाद राधा की सखी उन्हें चिढ़ा रही है। इस प्रसंग का निरूपण शलाका ने परिपक्व भाव व अभिनय के जरिए दर्शाया। युवा कलाकारों को इन दिनों कई समारोह में उन्हें अपनी कला को प्रदर्शन करने के अवसर मिल रहे हैं। इससे एक ओर युवा कलाकारों का रुझान इन कलाओं के प्रति बढ़ा है, वहीं दूसरी ओर उन्हें पहचान भी मिलने लगी है। वैसे भी कलाकारों के लिए मंच और दर्शक खास महत्त्व रखते हैं।