वह अचानक आ गया था। गिड़गिड़ाते हुए बोला, मेरा अपराध अक्षम्य है परंतु मेरा मन तो तुम्हीं में समाया हुआ है।’ जीवी को लगा, वह किसी पुराने ग्रंथ का कोई संवाद सुन रही थी। वह उसकी ओर अपलक देखती रही। अचानक उसने उपाध्याय के मुंह पर थूक दिया। आह, क्या विपदा आन पड़ी है। बीस वर्ष आनंद से गुजर गए। बाईस और वर्ष मैंने कैसे गुजारे हैं, इन का ढिंढोरा पीटना कितना कष्टप्रद लगता है। मेरा पति मुझे छोड़ कर भाग गया। कोई हड़कंप नहीं मचा। न ही कालेज में और न ही समाज में। सामंती पुरुष प्रधान समाज में आज भी यह सब हो सकता है। मेरे साथ तो यह हो ही गया है। तभी तो मैं दो-ढाई हजार की अनुकंपा या निराश्रिता पेंशन के लिए यहां भटक रही हूं।

वह लेबर इंस्पेक्टर के सामने बैठी थी। सरकारी विज्ञापन पढ़ कर वह बड़ी प्रसन्न हुई थी। उसे लगा था कि अब थोड़ी बहुत राहत मिल जाएगी। लगा कि सरकार सचमुच विधवा, छोड़ी गई या एकल औरतों के प्रति संवेदनशील है या उन्हें सशक्त करना चाहती है। लेकिन, उसमें भी विभाजक रेखा खींच दी जाती है कि इसको लाभ मिलेगा और इसको नहीं।

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‘भाई साहब, काम हो जाएगा?’ उसने आशा भरी नजरों से पूछा। ‘हो तो जाना चाहिए लेकिन एक किंतु है।’ ‘किंतु? क्या है वह किंतु?’ संकोचवश किरचू राम ने कहा, ‘बहन जी, आप के विवाह को बयालीस वर्ष हो गए हैं, और बाईस वर्ष अकेले रहते हुए। परंतु आप ने विधिवत तलाक नहीं लिया।’ ‘मैंने तलाक कब मांगा? आप भी अजीब बात करते हैं।’ वह क्रुद्ध स्वर में बोली। ‘तलाक नहीं लिया, यही तो गलती की है। आप बुरा मत मानिए। मैं तो नियमों की बात कर रहा था। मैं अदना सा मुलाजिम हूं, जरा सी गलती हो गई तो पटक दिया जाऊंगा।आप तलाक ले लो, फिर आप के पेंशन के कागज चल पड़ेंगे।’ उसने मासूमियत से कहा।

जीवन भी क्या चीज है। कोई समय होता है, जब हम सोचते हैं कि हम जो चाहे कर लेंगे, और कुछ भी हासिल कर लेंगे। लेकिन फिर कहीं सुई अटक जाए तो अटकी ही रह जाती है। सरपट दौड़ने वाली जीवी को लगा, वह भी जीवन की भागम-भाग में कहीं अटक-लटक गई थी। ‘अब इसके लिए कोई वर ढूंढ़ लो।’, मां ने कहा था। ‘मेरी नजर में एक डाक्टर लड़का है तो, लेकिन तुम्हारी लाडली हां करे तभी तो बात चलाएं?’, पिता ने कहा था। ‘मैं अभी आगे पढ़ना चाहती हूं, पीएचडी करना चाहती हूं। शादी की अभी से ही आप को क्यों चिंता होने लगी।’, जीवी बिफर उठी थी।
 पिता ने थोड़ी निराशा से अपनी प्यारी बेटी की ओर देखा, जिसका नाम उन्होंने जीवी इसलिए रखा था क्योंकि जीवी से पहले जो तीन संतानें उनके यहां हुई थी, उन में से कोई भी जीवित नहीं बची। जीवी ने उन दोनों पति-पत्नी का जीवन सार्थक किया।

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जीवी अपने अध्ययन में जुट गई थी और चाहती थी कि कुछ ऐसा शोध करे जो अद्भुत हो। पंजाब विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी उसकी मददगार थी। जो कोई पुस्तक वहां नहीं भी होती तो पुस्तकालयध्यक्ष वह पुस्तक इंटर लाइब्रेरी लोन पर मंगवा देते। उसने समय से पहले ही अपनी थीसिस पूरी कर ली थी।

‘बेटा, अब तो मान जाओ। वह डाक्टर लड़का अभी भी अविवाहित है।’ ‘उसे कोई और लड़की नहीं मिलती? कैसा लल्लू डाक्टर है वह?’, जीवी बोली थी। पति-पत्नी ने आपस में सलाह कर एक दिन एक और लड़के को अपने घर बुला लिया, ताकि कोई बात बन सके। जीवी को कुछ पता नहीं था। अजनबी लड़के को घर में देख कर जीवी भड़क उठी। रसोई में जा कर मां से बोली, ‘बैठक में कौन बैठा है? कोई साजिश करना चाहते हो? ‘बेटी, मां-बाप साजिश नहीं करते। बच्चों का भला ही चाहते हैं। तुम एक बार उससे मिल तो लो, देख लो। पसंद आए तो ठीक नहीं तो कोई बात नहीं है।’, पिता ने समझाया।

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वह तमतमाई हुई उठी और बैठक में जा कर बोली, ‘यहां लड़कियों की मंडी लगी है जो चौड़े हो कर बैठे हो? उठो यहां से और दफा हो जाओ। मां-बाप शर्मिंदा हुए। उस दिन के बाद वे चुप ही हो गए। जीवी कालेज में नौकरी ढूंढ़ने लगी। ‘आप बड़ी मेधावी लगती हैं। अच्छा बताओ, वेदों पर पद्मावत का क्या प्रभाव हुआ?’, राजाराम कालेज की प्रबंध समिति के अध्यक्ष लाला रीठाराम ने पूछा। ‘सर, वेद कब लिखे गए और जायसी का पद्मावत तो अभी कल की बात है। आप का प्रश्न अप्रासंगिक है।’ वह उठ कर बाहर आ गई, इंटरव्यू बीच में ही छोड़ कर। ‘अरे, बुलाओ उस को। बड़ी योग्य लड़की जान पड़ती है।’ वह अकड़ गई थी। वापस अंदर नहीं गई।

बाद में वह पछताई भी, जब बार-बार उसे नकार का दंश झेलना पड़ा। तीस इंटरव्यू देने के बाद एक टूटे से कालेज में उसे नौकरी मिल गई। कालेज ग्रामीण क्षेत्र में था, हां जगह शांतिपूर्ण थी। वह वहां रम गई और शादी के बंधन में बंध गई। पति प्रोफेसर न्योलेपाल ने कहा, ‘मैं तो जन्म जन्मांतर से तुम्हारी राह देख रहा था। तुम्हें पा कर मैं धन्य हो गया।’ जीवी को लगा, दुनिया में उस जैसा कोई नहीं। कामिनी कभी-कभार उस के पास आ कर बैठती, तो जीवी अपने पति की प्रशंसा करते न अघाती। कामिनी उसे मंत्रमुग्ध हो कर देखती रहती और उस के भावों को सहलाती रहती। जीवी कामिनी की बातों को सुन कर समझती कि वह दुनिया की सब से सुखी औरत है और इससे बड़ा सौभाग्य और क्या हो सकता है कि जैसा वह चाहती थी, वैसा ही पति उसे मिल गया था।

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किरचू राम को उस पर दया आई। बोला, ‘वह कैसा प्रोफेसर रहा होगा जो आप को छोड़ कर अचानक भाग गया और आप को पता भी नहीं लगने दिया।’ क्या छोटी सी पेंशन पाने के लिए उसे अपने फफोले भी खोदने पड़ेंगे? उसके मन में कामिनी घुस गई। वाह री, कामिनी। तुम मेरे पति को ही भगा ले गई, तेरा सत्यानाश हो। मेरे ही घर आती रही और मुझे ही छल गई। मां बाप की सुनी होती, तो उनसे गुहार भी लगाती। एक बात उसके मन में कौंध रही थी कि क्या औरत को सदा परजीवी बन कर ही रहना पड़ेगा? वह खुद कमाती थी परंतु निजी संस्थाओं में मिलता ही क्या है और उसका पति सरकारी नौकरी में चला गया तो वह एक नहीं दो-दो को धोखा दे सकता है और सरकार को नहीं पता चलता कि क्या हुआ है, और क्या हो रहा है? यह भी मैं बताऊं?

किरचू राम उसके प्रति भावुक हो चुका था। उसने बहुत अपनेपन से कहा, ‘मैम, मेरी सलाह मानिए तो आप सरकार में एक अर्जी ही डाल दीजिए कि प्रोफेसर न्योलेपाल मेरे पति हैं। उन्होंने नौकरी में रहते हुए ही दूसरी शादी कर ली थी और मुझे बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के छोड़ दिया था। इसलिए पेंशन में मेरा भी हक बनता है।’ जीवी को लगा कोई भूचाल आ गया था और उसका सिर बार-बार धरती से टकरा रहा था, मानो कोई शक्ति उसे धरती पर बेरहमी से पटक रही थी।