बाजार के अरण्य में

अच्युतानंद मिश्र की इस पुस्तक की मूल प्रतिज्ञा आज के पूंजीवाद-निर्मित समाज को मार्क्सवाद से अनुप्राणित चिंतकों के संदर्भ से विश्लेषित करना है। पिछले सौ से अधिक वर्षों के विश्व समाज और बौद्धिक घूर्णों को समझने के लिए मार्क्सवाद, फ्रायड और सस्यूर के सिद्धांतों और उनके विभिन्न सम्मेलनों को जानना जरूरी है। लेखक ने बहुत मनोयोग और साधना से यह कठिन कार्य किया है। लेकिन उनके प्रकाश वृत्त में मुख्यत: मार्क्सवादी सिद्धांतकार हैं, क्योंकि पूंजीवाद की जटिलता, टेक्नोलाजी विकास, संचार क्रांति तथा मनुष्य के आभ्यंतर में हो रहे परिवर्तनों को समझने की सटीक कुंजी संभवत: यहीं मिल सकती है। फूको, हैबरमास, ब्रौद्रिला, एडोर्नो और मार्खेज पर स्वतंत्र निबंध इसी प्रकार के अन्वेषण हैं। विलगाव, विज्ञान और मध्यवर्ग तथा आजादी के बाद का भारत अत्यंत बेधक प्रशस्त विश्लेषण हैं। ये सभी मिल कर हमारे विश्व और देश को समझने और सभी मायावी मुहावरों को ध्वस्त करने की शक्ति और दिशा प्रदान करते हैं।

लेखक ने तर्क सोपान निर्मित करते हुए, निरंतर पूर्व पक्ष का सम्मान करते हुए और एक खुदाई यांत्रिक की निपुणता और धैर्य के साथ अपने निष्कर्ष प्रकट किए हैं। ऐसी बौद्धिक शल्यक्रिया हमारी भाषा में विरल है। अच्युतानंद मिश्र अपनी बात पूरे बल से कहते हैं, पर कभी भी वार्तालाप के रास्ते बंद नहीं करते। बाजार के अरण्य में न तो रुदन है न दुस्साहस; बस एक अकंपित प्रकाश बल्लम है अंधेरों को बेधता। फर्ज कीजिए कि एक शख्स जिसकी उम्र तकरीबन दो सौ साल हो और वह जीवित हो तो उसकी आंख से इस दुनिया को देखना और समझना कैसा होगा? अच्युतानंद मिश्र की यह किताब इसी सवाल के जवाब की रोमांचक खोज यात्रा है।

बाजार के अरण्य में: अच्युतानंद मिश्र, आधार प्रकाशन, एससीएफ 267, सेक्टर-16, पंचकूला; 250 रुपए।

प्रयोग चंपारण

मेरा जीवन ही मेरा संदेश है’, कहने वाले गांधी ने चंपारण सत्याग्रह के दौरान अपनी वेश-भूषा बदली, भोजन बदला, संघर्ष का नया तरीका अपनाया और लगभग जादू वाले अंदाज में वहां के लोगों और बाहर से जुटे अपने सहयोगियों से जबरदस्त रिश्ता और संवाद कायम किया। जिस इलाके को वे नहीं जानते थे, जिस नील को नहीं जानते थे, जिस बोली- भोजपुरी और दस्तावेजों की कैथी लिपि को नहीं जानते थे, उनसे उनका संवाद और संबंध कैसे हुआ और उन्हें गांधी ने कितना बदला यह तो हैरान करता ही है, लेकिन गांधी ने चंपारण को नील से मुक्ति दिलाने के साथ देश और दुनिया को उस ब्रिटिश उपनिवेशवाद से मुक्ति दिलाने की शुरुआत भी कर दी, जिसका खुफिया और प्रशासनिक तंत्र हर घर, हर व्यक्ति से लेकर दुनिया पर नजर रखता था। और जब सड़क, रेल, फोन और लंदन से तीन-तीन केबल लाइनों के जरिए जुड़ कर यह महाबली खुश हो रहा था कि अब उसके राज को कोई खतरा नहीं हो सकता तब गांधी ने किस तरह अपने कम्युनिकेशन कौशल से राज को उखाड़ा, यह किताब उसी चीज को समझने की कोशिश है।

प्रस्तुत पुस्तक में गांधी के चंपारण सत्याग्रह के कम्युनिकेशन वाले इसी पक्ष पर ध्यान देने की कोशिश की गई है। दुनिया भर में बड़ी जनक्रांतियों और जनांदोलनों में संचार की इस तरह की भूमिका पर काफी काम हुए हैं- फ्रांसीसी क्रांति पर इस तरह का काम शायद सबसे चर्चित है। अपने यहां भी स्वामी सहजानंद के आंदोलन, बाबा रामचंद्र के किसान आंदोलन और बिरसा मुंडा के आंदोलन पर ऐसे काम हुए हैं। अब जब चंपारण सत्याग्रह को सौ साल बीत चुके हैं, यह पुस्तक एक व्यक्ति की असाधारण क्षमताओं को समझने भर के लिए ही नहीं, समाज की सोई ऊर्जा को जानने-समझने और उसे जगाने में संचार की भूमिका को जानने के लिहाज से भी महत्त्वपूर्ण है।

प्रयोग चंपारण: अरविंद मोहन, भारतीय ज्ञानपीठ, 18 इंस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, नई दिल्ली; 360 रुपए।

दृश्यांतर

दृश्यांतर’ नाटक, कला और सिनेमा के ज्वलंत प्रश्नों, समस्याओं और विचारणीय मुद्दों पर बहस करती है। प्रसिद्ध आलोचक ज्योतिष जोशी ने इस पुस्तक में जहां साहित्य से नाटक का संबंध, हिंदी रंगमंच की समकालीन चुनौतियां, पणिक्कर का रंग वैशिष्ट्य जैसे आलेखों के माध्यम से हिंदी रंगकर्म को समकालीन आवश्यकताओं के तहत देखने की चेष्टा की है, वहीं मनोहर सिंह और बव कारंत जैसे मूर्धन्य रंगकर्मियों के अवदान के बहाने समकालीन रंगमंच के प्रश्नों पर विचार किया है। इसी तरह आलोचक ने दृश्यकला में संप्रेषण के संकटों को समझते हुए कला में बाजारवादी खतरों से सावधान किया है। आलोचक ने पर्याप्त बल देकर कहा है कि पारंपरिक कलाओं के संरक्षण और उनका आज की दृश्यकला में उपयोग किए बिना उसे जनधर्मी नहीं बनाया जा सकता।

पुस्तक में भारतीय सिनेमा के पिछले सौ वर्षों की यात्रा पर विचार करते हुए हिंदी सिनेमा की वर्तमान स्थिति का भी परीक्षण किया गया है। हिंदी सिनेमा का सामाजिक सरोकार, सिनेमा में जीवन यथार्थ और दलित तथा सिनेमा में सांप्रदायिकता जैसे आलेख हिंदी सिनेमा की दुरभिसंधियों से परिचित कराते हैं और उसकी सीमाओं तथा संभावनाओं का पता देते हैं। यह किताब नाटक, कला और सिनेमा के समकालीन प्रश्नों पर विचार करती और हमारी सांस्कृतिक समझ तो बढ़ाती है। कलाओं से जुड़ी समस्याओं और उनके आसन्न संकटों को भी भांपती है।

दृश्यांतर: नयी किताब प्रकाशन, 1/11829, ग्राउंड फ्लोर, पंचशील गार्डन, नवीन शाहदरा, दिल्ली; 375 रुपए।

राग-विराग और अन्य कहानियां

शादी से पेशतर’ और ‘बूढ़ा चांद’ के बाद शर्मिला जालान की यह तीसरी किताब है। ‘बूढ़ा चांद’ कहानी के भोले, निश्छल और बेबाक चरित्र ‘तूलिका’ को गढ़ने वाली लेखिका ने चारों ओर हो रहे सामाजिक बदलाव में वयस्क युवती के मन की उलझनों को इस कहानी संग्रह में अच्छी तरह देखा है। इनमें आज की युवती के विभिन्न आकर्षण, द्वंद्व और कमजोरियां हैं, सभी उसे प्रभावित करते चलते हैं। स्त्रीवादी या मुक्तिवादी पूर्वाग्रहों के बिना, अपनी परिस्थितियों से गुजरते उसके मन की परतें क्रमश: खुलती चली जाती हैं।
शर्मिला की कलम का हुनर छपे-छपाए नमूने पर रंगीन ढंगों से तकिए के गिलाफ पर ‘स्वीट ड्रीम्स’ काढ़ना नहीं है। शर्मिला अपनी कलम के क्रोशिए की नोक से उन आकृतियों की कशीदाकारी करती हैं जो उनके घर के बरामदे, मोहल्ले और शहर में सांस लेने का परमिट मांगती हुई सांसों के हैं- बेजार खामोश वाचाल सायों की आकृतियां।

शर्मिला के लेखन की विशेषता यह है कि वे ‘वास्तविकता’ को भेदने की क्षमता रखती हैं, और जो ‘मनडेन’ है, रोजमर्रा का कोई साधारण प्रसंग या विवरण है, उसके सहारे वे बात को दूर तलक ले जाती हैं, कुछ इसी भाव से कि ‘बात निकली है तो फिर दूर तलक जाएगी।’ इसमें शर्मिला ने बातचीत की भाषा और सरल शैली को अपनाया है। प्रचलित दुरूह तकनीकी प्रलोभनों से अपने को बचाए रखा है। फलस्वरूप पाठक भटके बिना कहानी का मर्म सहजता से अपने साथ पाता है।

राग-विराग और अन्य कहानियां: वाग्देवी प्रकाशन, विनायक शिखर, पॉलिटेक्निक कॉलेज के पास, बीकानेर; 280 रुपए।