मीनाक्षी प्रसाद
वीणा पाणी की वरद् सुता स्व. रामदेव राय की दुहिता स्व. गिरिजा देवी थीं । नाम के आगे स्व. लिखते ही नेत्रों से अश्रुजल निकल रहे हैं। 24 अक्टूबर 2017 की काली रात काल अप्पाजी को अपने साथ उस अनंत यात्रा पर ले गया जहां से कोई वापस नहीं लौटता है । अपनी मृत्यु से एक दिन पहले उन्होंने काफी देर तक भजन “गोविंद गुनगुनाओं” गाया, मानो नारायण स्वयं उन्हें उनके प्रस्थान का आभास देने आए हों । उनकी आत्मा बहुत पवित्र थी । स्वर साधना के दम पर जग जीता जिस विभूति ने, पूरी दुनिया में मशहूर थीं हमारी अप्पाजी। सुर ही उनका आभूषण था। पद्मश्री, पद्मभूषण, पद्मविभूषण जैसे देश के गौरवशाली और श्रेष्ठ सम्मान उनको सुशोभित कर अपने भाग्य पर इतराते थे। उन्होने संगीत की तालीम कोई 4 वर्ष की उम्र से पं. सरजू प्रसाद मिश्रा से लिया और उनकी मृत्यु के बाद पं. श्रीचंद मिश्रा जी से भी सीखा।
भारतीय शास्त्रीय संगीत में अद्भुत स्वर्णिम इतिहास रचने वाला वह व्यक्तित्व जिनके सामने ठुमरी, दादरा, चैती, कजरी, झूला, पूर्वी सभी विधाएं हाथ बाँधे खड़ी रहती थीं कि आज अप्पाजी सबसे पहले किसे गाना पसंद करेंगी। संगीत की भक्ति ही इनकी शक्ति थी। ठुमरी को गिरिजाजी ने एक विशेष मक़ाम पर पहुंचाया ।
अप्पाजी की सादगी ही उनकी खूबसूरती थी। उनकी नाक का हीरे का लौंग, सफेद साड़ी व चंदन का टीका मानो मां शारदे स्वयं गाने बैठ गई हों। उनके सान्धिय में जो भी आया वो धन्य हुआ। उनमें से एक भाग्यशाली इंसान मैं भी हूँ, जिसे अप्पाजी की शिष्या नहीं होते हुए भी अप्पाजी का अथाह प्रेम मिला। इस सत्य को आज स्वीकारना दुरुह है कि अप्पाजी हमारे बीच नहीं है। इनकी छाँव में ना जाने कितनी शिष्याएँ और शिष्य पल रहे थे, ये गिनती करना मुश्किल है। कई सीधे सम्पर्क में, तो कई एकलव्य की भाँति इनसे सीख रहे थे। कहते हैं सोहवत का असर होता है, इनके साथ रहने पर आप स्वयं ही इनके व्यक्तित्व की सादगी से प्रभावित होने लगते थे। इन्होंने ना जाने कितनी ठुमरियों, कजरी, झूला, दादरा का सृजन किया, जिनमें से चैती ‘‘चढल चैत चित लागे ना रामा बाबा के भवनमा’’ तथा झूला ‘‘जुगल वर झूलत दे गलवाही’’ आदि बहुत मशहूर हुई हैं। मशहूर ठुमरी ‘‘रस के भरे तोरे नैन’’ उनकी पसंदीदा ठुमरियों में से एक है। उन्हें ‘रसमलाई’ खाना बहुत पसंद था।
पहली बार मैंने गिरिजादेवीजी को कोई पांच-छः वर्ष की उम्र में पटना में लँगरटोली मोहल्ले में भारत माता मंडली द्वारा दशहरा त्यौहार के अवसर पर आयोजित बृहद सांस्कृतिक कार्यक्रम में देखा था। उनकी निश्छल मुस्कुराहट और हीरे की लौंग की चमक के साथ उनका भैरवी राग पर आधारित वो ठुमरी ‘‘बाबुल मोरा नइहर घुटो ही जाय’’ ने मेरे दिमाग पर इतना गहरा असर किया कि मैं बिना समझे वो ठुमरी गीत की भाँति गुनगुनाती रहती थी और मुझे भी लगता था कि मैं भी इनकी तरह इतने बड़े मंच पर गाउँ। मेरा उनसे बात करने का बहुत मन करता था। संगीत भी मेरे मन से नहीं निकल रहा था।
फिर सालों बाद, शोध के क्रम में गिरिजा जी का साक्षात्कार मिला। मेरी गुरू सविता देवी मुझे उनसे मिलाने ले गई थीं। उस दिन अप्पाजी (गिरिजा देवी) की तबीयत ठीक नहीं थी, फिर भी उन्होंने मिलने से इनकार नहीं किया। जैसे ही उन्होंने मेरी गुरु को देखा तो कहने लगींं ‘‘माई (सविता जी की माँ सिद्धेश्वरी देवी जी) के बाद हम बहुत साल सम्हाल देनीं, सविता अब तू जिम्मेदारी लेके सम्हाला। हमार तबियत अब ठीक नाहीं रहेला।’’ सविताजी ने बड़ी शालीनता से मुस्कुरा कर हामीं भरी मानों कह रहीं हों, अप्पा मैं अपनी तरफ से कोई कमी नहीं रहने दूँगी पर हम सभी को आपकी छाया व आशीर्वाद की आवश्यकता है।
करीब ढाई घंटे के साक्षात्कार में वह उस दिन ठुमरी के सागर में मुझे डुबो रही थीं। उन्होंने ये स्पष्ट कहा कि गायक या गायिका को ठुमरी गायन में बोल – बनाव की छूट है पर ठुमरी की मौलिकता कायम रहनी चाहिए । बीच-बीच में वह यह भी कहतीं कि मुझे अकेले रहना कभी पसंद नहीं है और लोगों से मिलना बहुत पसंद है।
भारतीय शास्त्रीय व उपशास्त्रीय संगीत की एक मजबूत स्तम्भ को हिन्दुस्तान ने खो दिया है जिसकी क्षतिपूर्ति कभी नहीं हो सकती। परन्तु उनकी ठुमरी गायन को जीवित रखने के लिए हम सभी प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने अपनी जन्मभूमि काशी का कर्ज़ अपने सुर से उस नगरी को सजाकर, उसे सम्मान दिलाकर ऐसे उतारा जो अतुलनीय है।
