शशिप्रभा तिवारी
वरिष्ठ संस्कृतिविद् और नृत्य साम्राज्ञी सोनल मानसिंह को सुमित्रा चरितराम लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया। वरिष्ठ नृत्यांगना सोनल मानसिंह सिर्फ एक नृत्यांगना नहीं है, बल्कि संस्कृति और शास्त्र की मर्मज्ञ हैं। उन्होंने नृत्य को सिर्फ करिअर नहीं बल्कि अपने जीने का माध्यम बनाया है। इसलिए, वह नृत्य के साथ अभिनय, संवाद और गायन करती हैं। यही वजह है कि उनके गायन, वादन और नृत्य से संगीत की पूर्णता उनकी प्रस्तुति में नजर आती है।
श्रीराम भारतीय कला केंद्र की ओर से आयोजित सम्मान समारोह के दौरान नृत्यांगना सोनल मानसिंह ने नृत्य रचना ‘कृष्ण’ पेश की। पेशकश के क्रम में संवाद में सोनल कहती हैं-श्रीकृष्ण की अनंत यात्रा है। हमारे जीवन की यात्रा का समय सीमित है। उस सीमा में रहते हुए, श्रीकृष्ण के स्मरण में हम उनके साथ समय बिताएं, ऐसा कभी-कभी अनुभूतियों में होता है। वही कृष्ण जो गोप-गोपियों के संग रासमय है, जो सखाओं के साथ खेल रहे हैं। पर सुना है, एक गोपिका और भी है, जिसे चांद रात भर ताकता है, सुना है दिन में तितलियां उसके इर्द-गिर्द घूमती हैं, वह राधा है।
नृत्य का आगाज जयदेव की रचना ‘जय जय देव हरे’ के गायन से हुआ। गायक बंकिम चंद सेठी के साथ-साथ सोनल भी सुर में सुर मिलाती हैं। वह हस्तकों, मुद्राओं और भावों के जरिए विष्णु के दशावतार को दर्शाती हैं। अगले अंश में वह राधा के रूप का सुंदर वर्णन गीत ‘कमर पतली, नजर बिजली’ में मोहक अंदाज में करती हैं। कृष्ण के चलन को चारी भेद के जरिए कई अंदाज में उन्होंने दर्शाया। यहीं, संवाद में राधा से कृष्ण पूछते हैं, ‘पूछ रहे हैं, श्याम कौन तुम गोरी?’ इसके जवाब में राधा कहती हैं, ‘वृषभानु की बेटी मैं, बड़े बाप की बेटी’।
कृष्ण और राधा की नोंक-झोंक और छेड़-छाड़ को कुछ नए ढंग से नृत्यांगना सोनल मानसिंह चित्रित करती हैं। इसके लिए रचना ‘कृष्ण कन्हैया राधा गोरी’ को गाते हुए, वह विविध प्रसंग को निरूपित करती हैं। यहीं उन्होंने रचना ‘घन कालिया वनमाली नीलरतन’ के जरिए गोपिका और राधा के विरह भाव का जिक्र किया। नृत्य रचना के अंत में सुदामा चरित का चित्रण भावपूर्ण रहा। सोनलजी ने स्वर्णिम द्वारका नगरी का उद्भव, सुदामा सुशीला, कृष्ण सुदामा, कृष्ण, रुक्मणी संवाद के जरिए प्रसंग का वर्णन किया। इस अंश में तांबूल बनाने के लिए सोलह चीजों के प्रयोग के बारे में हस्तकों से बताना महत्वपूर्ण था। साथ ही, कृष्ण की महिमा का गान रचना ‘महिमा यह यदुनाथ की सुना प्राणनाथ’ मनोहर था।
