प्रयाग शुक्ल

जब भी हम वृक्षों की ओर देखते हैं, उनकी शाखाएं भी ध्यान में आती हैं। पर, सामान्यतया हम उनके विभिन्न रूपों को भूले रहते हैं- वे भली भांति तो तभी दिखती हैं जब हम उन पर दृष्टि एकाग्र करते हैं : फल-फूल तोड़ने के लिए। उन पर झूला डालने के लिए। या किसी झुकी हुई डाल को ही झूला बना लेने के लिए। वे तब भी दिखती हैं, जब उनके वृक्ष के पत्ते झर चुके होते हैं, और वे बिना पत्तों के, एक बारगी नजर में आ जाती हैं। वे तब भी दिखती हैं, जब हम किसी गिलहरी, किसी चिड़िया, किसी बंदर, किसी मयूर को कौतूहल वश देखते हुए, अपनी आंख को उसके साथ-साथ, वहां घुमा रहे होते हैं, जहां-जहां उसका कोई ‘खेल’ चल रहा होता है। और जब हम सचमुच उनके ‘रूप अनेक’ पर ध्यान धरते हैं तब तो उनकी प्रकृति, उनकी विभिन्नताओं पर कुछ चमत्कृत होते हैं।

कभी-कभी देखता हूं किसी वृक्ष की डालों को इस तरह, मानो, उन्हें ‘पढ़’ रहा होऊं, या उन्हें किसी चित्र में चित्रित होता देख रहा होऊं! वे बड़ी मोटी भी होती हैं। दुबली-छरहरी भी। सीधी और वक्र भी। वे ऊर्ध्वमुखी भी हो सकती हैं, और चौड़ाई में फैली हुई भी। वे घने पत्तों के बीच छिपी हुई भी हो सकती हैं, और कम पत्तों के साथ कुछ ‘खुली’ हुई भी। जिस डाल पर घोंसला हो, वह भी अलग दिखती है। वृक्षों की प्रजातियों के साथ उनके रूप वैसे भी बदल जाते हैं। सोचिए जरा, जरा-सा ध्यान धरिए- पीपल, नीम, आम, महुए, बबूल के वृक्षों पर, उनके अलग-अलग रूपों का भान आपको तत्काल हो जाएगा। और यह तो है ही कि एक ही प्रजाति के वृक्षों में से, हर वृक्ष का कुछ अपना रूप-स्वरूप भी होता ही है, उसी के हिसाब से शाखाओं का रूप भी बदल जाता है। किसी वृक्ष की शाखाएं, दूसरे वृक्ष की शाखाओं से हूबहू कभी मिलती नहीं हैं।

कभी-कभी शाखाओं को लेकर बड़ी दिलचस्प चीजें भी घटित होती हैं। बचपन में हम अपने गांव के एक पेड़ पर चढ़ कर आम तोड़ते थे, तो यह समझ नहीं पाते थे कि एक ही पेड़ पर ये अलग-अलग स्वाद देने वाली डालें कहां से आ गई हैं। उस पेड़ के आमों के आकार-प्रकार भी भिन्न लगते थे। उस पेड़ का नाम था- ‘सतपेड़ा’। यानी सात पेड़। धीरे-धीरे हमने पहचाना कि उस पेड़ में अलग-अलग आम वृक्षों के तने एक-दूसरे से लिपटे हुए हैं। पता नहीं, वे सचमुछ सात तनों का मिलन था या उसको ऐसा नाम दे दिया गया था। जो भी हो, तीन-चार पेड़ तो वे एक साथ, एक-दूसरे में लिपटे हुए थे ही। जो लोग अपने बचपन में किसी पेड़ पर चढ़े हैं, वे भला उनकी डालों को कैसे भूल सकते हैं। उन डालों में छिपने की सुविधा थी। बैठने की भी। कभी-कभी लेट जाने की भी- कुछ डालें बहुत मोटी जो होती हैं।

शाखाओं-प्रशाखाओं का चित्रण काव्य और कला में भी भरा पड़ा है। उनके नाम पर कृतियों के नाम भी हैं, क्योंकि शाखा एक रूपक भी है, एक प्रतीक भी। सत्यजित राय की बांग्ला फिल्म है ‘शाखा-प्रशाखा’। और भी बहुतेरे होंगे, हिंदी में, भारतीय भाषाओं में। शाखाओं का गुणगान संस्कृत वांग्मय में भी बहुत हुआ है। एक उदाहरण देखिए- सेमल के पेड़ की शाखाओं के वर्णन का : यह वर्णन संस्कृत के एक कवि उमापति द्वारा किया गया है, और श्रीधर दास के सदुक्तिकणार्मृत (अनुवाद : राधावल्लभ त्रिपाठी) में संकलित है।  ‘शाखाओं का ऐसा यह प्रसार कि गगन के विस्तार को ढक ले/ फूलों की यह समृद्धि/ लाल कमल के वन जैसा/ तुम्हारी शोभा का क्या कहना, वाणी से भी उनका वर्णन है कठिन/ सेमल के पेड़…’

हां, बिना शाखाओं के वृक्ष कहां! फल-फूल कहां! उनकी शोभा और उपयोगिता कहां! और उनके बिना कहां, और कैसे हो सकती हैं, उन पर मंडराने वाली भ्रमरों, मधुमाखियों, पंछियों की कतारें। कहां गूंजते रह सकते हैं, उनके बिना, उनके भीतर से मधुर बोल कोकिल के। कैसे आच्छादित कर ले सकती हैं बौरें आम के पेड़ को उनके बिना। कैसे खिल सकते हैं चंपई फूल, चंपा के! कैसे झर सकता है ‘झर झर झर’ हरसिंगार, हरसिंगार की डालियों के बिना।
जोड़ते जाइए, इस सबमें, वह सब जो आपको याद आ ही जाएगा, शाखाओं के प्रसंग से! ‘सदुक्तिकणार्मृत’ में संस्कृत कवि ईश्वरचंद्र की ये पंक्तियां भी सुखकारी हैं, पीपल को लेकर लिखी हुई- ‘इस पीपल की छाया में तुमने आनंद किया/ इसकी डालें खींच खींच कर तोड़ीं/ और खाए पत्ते/ इसकी लाज से क्या अब इसके नीचे नहीं कर रहे हैं विश्राम, हे गजराज!/ भाग्य ने कुछ वैसा ही रच रखा है योग/ कि तुम्हारे जैसे करोड़ों हाथी आए/ इसकी ऐसी ही दशा करके चले गए/ और यह फिर हो गया वैसा ही नई कोपलों से लदा हुआ।’

परखी जाती हैं डालों की मजबूती या कोमलता भी। हमारे यहां झूले प्राय: नीम के वृक्षों पर ही डाले जाते रहे हैं, मजबूत डालों की पहचान करके ही, कि वजनी स्त्री-पुरुष भी बैठ जाएं तो डाल टूटे नहीं। ऐसे ही अवसरों पर डालों के ‘सनमुख’ कृतज्ञता के साथ हुआ जाता है। वे मजबूत डालें न होतीं, तो सावन में झूलने का आनंद भला कैसे आता! शाखा की प्रशाखा तो होती ही है, हर शाखा-प्रशाखा की अपनी टहनियां भी होती हैं, कई वृक्षों में। वे भी शाखाओं की शोभा बढ़ाती हैं। अनेक रेखाओं के पुंज के रूप में। मुझे शाखा-प्रशाखा-टहनियों की शक्ल इसलिए भी आकर्षित करती है कि वे किसी रेखांकन की रेखाओं-सा आनंद भी प्रदान करती हैं।

शाखाएं-टहनियां प्राय: काली, सांवली होती हैं। कुछ वृक्षों पर एक रूपहली या राख-रंग की बड़ी महीन-सी परत चढ़ी हुई मालूम पड़ती है। वे कुछ अन्य रंगों की भी हो सकती हैं। पर, जब किसी वृक्ष में पत्ते नहीं रहते, उसके सूख जाने पर या पतझर के बाद-तो उसकी डालें अगर काली, सांवली हुर्इं तो वे आकाशी पृष्ठभूमि में स्याही-रेखांकन की ही तो याद दिलाता है।  त्रिलोचन जी की एक बड़ी सुंदर कविता है ‘साथी है सेमल पुराना’। इन पंक्तियों पर गौर करिए : ‘पत्तियां/ अनेक पतझरों को लुटा चुका/ उल्लसित होकर/ पुष्पोत्सव मना चुका/ रंग दिया दिशाओं को/ हृदय में संजोई हुई/ अरुण तरंग से/ डाल डाल, टहनी टहनी,/ जगमगा उठी/ हुलास से/ नीले आसमान को/ सुहाने लाल फूलों को/ गुच्छा एक/ पृथ्वी ने मौन उपहार दिया।’

तो यह जो ‘डाल डाल टहनी टहनी’ का हुलास से जगमगा उठना है, और जिसे कवि ने देखा, अनुभव किया है, वही तो वृक्ष से, पृथ्वी के इस अनमोल उपहार से हमारा रिश्ता तय करता है।  हां, देखिए तो यह डाल-डाल से जो हम सबका संबंध है, वह कितना अनमोल है। अचरज क्या कि कांगड़ा शैली के चंबा शैली के मिनियेचर चित्रों में जब हम मनोहर वृक्षों को, उनकी डालों को देखते हैं, तो गजब की एक सरसता का, आनंद का अनुभव करते हैं! लोक में भी उनका उत्सव मनाया जाता है। और समकालीन ‘आदिवासी’ कलाकार जनगढ़ सिंह श्याम हों या भूरी बाई, उनके चित्रों की डालियां-टहनियां भी कितनी अपूर्व हैं। वृक्षों के फल-फूलों, पत्तों से, जो ‘रस’ हमें मिलता है, वह उन्हें धारण करने वाली डालियों-टहनियों के सबब से ही तो! कोई भी, कैसी भी ‘मधुर’ डाल जब वृक्ष से अलग होकर धरती पर आ रहती है, या जब कोई डाल इतनी झुक जाती है कि हमारा रास्ता रोक लेती है, और हम उसे निकट से देखते हैं, तो उस मधुर संबंध को मानो एकबारगी अनुभव करते हैं, जो हमारा ‘शाखा-प्रशाखाओं’ से है, और होना चाहिए। ‘निराला’ की उस कविता का स्मरण भी तो हो आया है, जो डाल को लेकर है :
‘रूखी री यह डाल, वसन वासंती लेगी
हीरक-सी समीर/ माला जब
शैल-सुता अपर्ण अशना
पल्लव-वसना बनेगी-
वसन वासंती लेगी।’
और वे कविता पंक्तियां ‘सुर तरुवर शाखा/ खिली पुष्प भाषा’ तथा ‘डाल पानी पर झुकी हुई।’ हां, जल पर झुकी हुई डालें। धरती पर लोटने को आई डालें। और आकाश छूती डालें। लहरातीं। सरसराती डालें। पत्ते गिराती डालें। उषा की आभा में चमकती डालें। संध्या को चिड़ियों से भर जाती डालें!
भला कोई अंत है- उनके रंग-रूप का!