पुरुष कलाकारों का हिंदुस्तानी शास्त्रीय नृत्य जगत में अन्यतम स्थान है। यह सच है कि शास्त्रीय नृत्य को सिखाने वाले और इसको एक पराकाष्ठा तक पहुंचाने में गुरुओं का खास योगदान रहा है। बदलते समय के साथ बहुत कुछ बदलता है। लेकिन, शास्त्रीय नृत्य को आत्मसात करते हैं और इसे ही अपना सर्वस्व मानकर, साधना में निमग्न हो जाते हैं तो समय के साथ पहचान मिल जाती है। पर इसके लिए कलाकारों को काफी संघर्ष करना पड़ता है। युवा भरतनाट्यम नृत्क सोहैल भान ऐसे ही कलाकार हैं। पिछले दिनों एक समारोह में उन्होंने भरतनाट्यम नृत्य पेश किया।
सोहैल भान ने भरतनाट्यम नृत्य को गुरु जस्टीन मैकार्थे के सान्निध्य में सीखा है। उनके सीखने का क्रम अभी भी जारी है। वह मानते हैं कि प्रदर्शन कला में रोज रियाज और सीखना जारी रहता है। नृत्य जीवंत कला है, इसलिए यह लगातार परिष्कार की मांग करती है। सोहैल ने अपने नृत्य का आरंभ नृत्य रचना ओम से किया। यह प्रस्तुति शास्त्रीय गायिका शुभा मुद्गल के संगीत पर आधारित थी। उनकी दूसरी पेशकश भजन ‘अच्युतम केशवम राम नारायणम’ थी। इस भजन पर कथक के कई कलाकारों ने भी नृत्य किया है। भरतनाट्यम में यह एक नया प्रयास था। उनकी अगली पेशकश दो तिल्लाना थी। एक राग काफी और आदिताल में निबद्ध थी। जबकि दूसरी राग सिंधु भैरवी और आदि ताल में निबद्ध थी।
भरतनाट्यम नृत्क सोहैल भान ने मुत्थुस्वामी दिक्षितर की कृति पर आधारित नृत्य पेश किया। यह राग कुमुदप्रिया और चतुश्रम ताल में निबद्ध था। इसमें भृगु, अगस्त्य और वशिष्ठ के भक्ति को निरूपित किया गया। साथ ही, इसमें शिव और पार्वती के रूप का मनोरम वर्णन भी दर्शाया गया था। इस नृत्य में आंगिक चेष्टाएं और हस्तकों को बरतने का अंदाज काफी सधा हुआ, नजर आया। उनकी नृत्य की पराकाष्ठा के उस्ताद जाकिर हुसैन की एक रचना पर अभिनय पेश किया। इसमें उन्होंने बरसाना छोड़कर, मथुरा जाते कृष्ण के प्रसंग को चित्रित किया। इस अंश में उन्होंने राधा के आतुर भावों का विवेचन किया। उनका अभिनय काफी परिपक्व था।
भारतीय शास्त्रीय कलाओं में अध्यात्म घुला-मिला है। नृत्य की भंगिमाएं, खड़े होने का अंदाज, अंग संचालन सभी कहीं न कहीं योग से जुड़े हुए हैं। आप इसे अवचेतन मन से अपनाते हैं। इस संदर्भ में सुहैल कहते हैं कि नृत्य के जरिए हम भारतीय दर्शन को अच्छी तरह समझ सकते हैं। इससे हमारे अंदर आत्मनिर्भरता, आत्मसम्मान, आत्मशांति के भाव आता है। हमें जीवन की सच्चाई को सहजता को स्वीकार करना आ जाता है। जीवन में रूकावटें तो आती रहेंगी, पर हमें अपनी कोशिश हमेशा जारी रखनी चाहिए। तभी हम आगे बढ़ पाएंगे, न सिर्फ नृत्य के क्षेत्र में बल्कि जीवन में भी। अकसर मुझे महसूस होता है कि जो हो रहा है, वो सब अच्छे के लिए हो रहा है। हम थोड़ी देर परेशान तो जरूर होते हैं कि हमारा चाहा हुआ नहीं होता। उस समय हम यह भूल जाते हैं कि सृष्टिकर्ता की इच्छा के बिना संसार में कुछ नहीं हो सकता। जब उसकी इच्छा होती है, तभी एक पत्ता हिलता है। हमें सकारात्मक रहकर आगे बढ़ना है। हां, उसमें समय जरूर लगता है।

