रोहित कुमार

इतना ही समझ पाते हैं।’ नाटक की केंद्रीय पात्र सुंदरी के इस संवाद के साथ पर्दा गिर जाता है। संसार और संन्यास में उलझा पति और रूप गर्विता पत्नी के बीच आते हैं भारत के धर्म का नक्शा बदल देनेवाले बुद्ध। भोग और निर्वाण के बीच का द्वंद्व दिखाता यह नाटक ऐतिहासिकता में समकालीनता की मांग करता है। क्या बुद्ध तथागत सिर्फ इसलिए बन पाए कि उन्होंने यशोधरा का त्याग किया? बुद्ध के धम्म यानी मुक्ति मार्ग की विवेचना को किस तरह देखा जाए? इन्हीं सवालों के साथ बौद्धकालीन भारत के दांपत्य में स्त्री-पुरुष संबंधों को रंगमंच पर उतारा गया कालिदास अकादमी, उज्जैन के अभिरंग नाट्यगृह में। नाट्य संस्था अभिनव रंगमंडली की इस प्रस्तुति की खासियत यह रही कि नाटक को बिना किसी सूत्रधार के मंचित किया गया। नाटक की परिकल्पना एवं निर्देशन शरद शर्मा का था।

नाटक की पृष्ठभूमि में है तथागत का वह आंदोलन जो पूरे भारत की धार्मिक तस्वीर बदल रहा था। नाटक बुद्ध के सौतेले भाई नंद और उसकी पत्नी सुंदरी के इर्द-गिर्द रचा गया है। नंद की पत्नी सुंदरी भोग-विलास की प्रतिनिधि है, जिसका मानना है कि बुद्ध के बैराग्य के पीछे उनकी पत्नी यशोधरा की विफलता है। सुंदरी बुद्ध को चुनौती देती है कि वह लहरों के राजहंस को निर्वाण के पथ पर ले जाएं। सुंदरी का अहंकार तब टूट जाता है जब उसके द्वारा आयोजित काम उत्सव में अतिथि नहीं आते हैं। अतिथि बुद्ध के प्रभाव में आकर इस उत्सव से दूर हो जाते हैं। यह घटना सौंदर्य और चातुर्य की स्वामिनी सुंदरी के जीवन में नया संघर्ष ले आती है।

नंद का व्यक्तित्व विभाजित है। कभी वह पत्नी का समर्पित प्रेमी बन जाता है तो उसी वक्त उसे बुद्ध का संघ भी अपनी ओर खींचने लगता है। वह न पत्नी का है और न तथागत का। संसार और सन्यास के बीच उलझ कर वह दुखी अवस्था में ही रहता है। जब वह कहता है, ‘तथागत से पूछूंगा कि उन्होंने मेरे केशों का क्या किया। अगर मेरे केश अब भी उनके पास हैं तो वे उन्हें लौटा दें। मेरी पत्नी को मेरे केश ही चाहिए।’ सुंदरी को अहसास होता है कि उसके पति की इतनी ही समझ है कि वह उसके केशों से प्यार करती है। वह सुंदरी जो बुद्ध के पूरे आंदोलन को चुनौती दे रही थी, समझ नहीं पा रही थी कि वह खुद को कितना समझती है।

बुद्ध और उनके धार्मिक विचारों को साहित्य या मंच पर उतारना बहुत आसान नहीं होता है। खासकर ऐतिहासिकता जब समकालीनता की मांग करे तो बुद्ध और जटिल हो जाते हैं। बुद्ध और उनके आंदोलन को जिस तरह मंच पर उतारा गया वह सराहनीय है जिसे और श्रेष्ठ बनाने की संभावना दिखती है। प्रकाश संयोजन ने नाटक की कथावस्तु को उभारा। केंद्रीय कलाकारों ने अपनी ओर से बेहतरीन किया।