श्रीभगवान सिंह
साहित्य का स्वधर्म मनुष्य-मनुष्य और मनुष्य-मनुष्येतर के बीच विद्यमान विभेदों को मिटा कर पाठक को सामान्य मनुष्यता के धरातल पर ला खड़ा करना होता है। साहित्य में संवेदना जाति, संप्रदाय, वर्ग, वर्ण या लिंग विशेष से परे होकर पाठक को लोक हृदय में लीन करती है, जो आचार्य शुक्ल के शब्दों में ‘रस-दशा’ कहलाती है। ऐसे में पाठक को वह संवेदना उसके साथ एकात्म कर देती है, जो अन्याय, उत्पीड़न, दलन, दमन का शिकार होता है और तब पुरुष न पुरुष का समर्थक रह जाता है, न स्त्री स्त्री की। सहृदय पाठक अभिजात या उच्च कुल, वर्ण, वर्ग का भी समर्थक न रह कर पीड़ित दमित पात्रों के साथ पूरी सहानुभूति, करुणा के साथ खड़ा हो जाता है।
‘महाभारत’ में ही ऐसे अनेक कथा-प्रसंग हैं, जो इस कथन को सत्यापित करते हैं। मसलन, सावित्री जब अपने मृत पति सत्यवान को जीवित कराने के लिए यमराज से वाक्युद्ध करती है, तो पुरुष होते हुए भी पाठक यमराज के पक्ष में नहीं, बल्कि अपनी पूरी सहानुभूति, संवेदना तथा शुभेच्छा के साथ सावित्री के पक्ष में खड़ा महसूस करते हैं, क्योंकि भरी जवानी में एक स्त्री को यमराज द्वारा विधवा बनाए जाने के निष्ठुर कार्य का औचित्य स्वीकार नहीं कर पाते। यहां पुरुष बनाम स्त्री का कोई सवाल नहीं रह जाता।
महाभारत में ही राजा दुष्यंत और शकुंतला की प्रेम-कथा है। गंधर्व विवाह करने के बाद जब शकुंतला कुछ समय बाद राजा दुष्यंत के दरबार में जाकर उससे अपने को पत्नी रूप में स्वीकार करने की गुहार लगाती है, तब दुष्यंत उसे पहचानने से इनकार कर देता है। फिर शकुंतला दुष्यंत की बहुत तीखे शब्दों में भर्त्सना करने लगती है। इसे पढ़ते हुए पुरुष पाठक भी शकुंतला के पक्ष में खड़ा महसूस करते हैं। राजा दुष्यंत को ऐसी धृष्टता, कृतघ्नता के लिए कोसने लगते हैं। जब आकाशवाणी से गंधर्व विवाह सत्यापित होता और दुष्यंत शकुंतला को स्वीकार करता है, तब पुरुषों को भी अपार प्रसन्नता होती है। इसी तरह द्रौपदी के चीर-हरण के समय दुश्शासन, दुर्योधन से लेकर पितामह भीष्म, धृतराष्ट्र, द्रोणाचार्य, कर्ण सबके प्रति असीम क्रोध से उबल पड़ते हैं, जो एक स्त्री की लज्जा बचाने में असमर्थ दिखते हैं। आज तक किसी पुरुष को दुश्शासन, दुर्योधन के साथ एक स्त्री के प्रति ऐसा जघन्य, घृणित कार्य करने के लिए प्रशंसा का भाव रखते नहीं देखा गया। क्या यह सब पुरुष वर्चस्व का प्रमाण है!
‘रामायण’ में भी मंथरा और कैकेयी के कारण जब राम-सीता को वनवास होता है, तो कैकेयी और मंथरा दोनों ही भर्त्सना की पात्र बनती हैं और राम-सीता को पुरुष, स्त्री दोनों की सहानुभूति मिलती है। ‘कहहिं परस्पर पुर नर नारी, भली बनाइ विधि बात बिगारी।’ फिर सीता का अपहरण करने और उन्हें नाना विधि प्रताड़ित करने वाले दशानन का भी कोई सभ्य पुरुष आज तक समर्थक नहीं हो सका।
आधुनिक काल की हिंदी कहानियों में भी इस बात के काफी प्रमाण हैं। प्रेमचंद की कहानी ‘पंच परमेश्वर’ में जुम्मन शेख अपनी खाला के साथ जैसा उपेक्षापूर्ण व्यवहार करता है, उससे पाठक, पुरुष हो या स्त्री, खाला का ही पक्षधर बनता है और जब अलगू चौधरी पंच के रूप में खाला के पक्ष में फैसला देता है, तो पाठक एक औरत की जीत पर प्रफुल्लित हो उठते हैं। रामवृक्ष बेनीपुरी की कहानी ‘कहीं धूप कहीं छांव’ में जब जमींदार बेगारी करने से इनकार करने पर गरीब मखना की अपने सिपाहियों से बेरहमी से पिटाई कराता है, तो पाठक के अंदर उस जमींदार के प्रति क्रोधाग्नि की लपटें उठने लगती हैं। इसी तरह जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘विराम चिह्न’ में जब पंडे मंदिर में प्रवेश करने के लिए अछूतों का नेतृत्व कर रहे राधे पर लट्ठ चला कर उसे मांस का लोथड़ा बना देते हैं, तो उन पंडों के प्रति पाठक गुस्सा-नफरत से तिलमिलाने लगते हैं।
इसी प्रसंग में तॉल्स्तॉय की कहानी ‘नाच के बाद’ ध्यान आती है। इसमें काउंट वर्ग के एक रूसी अफसर की निगरानी में कुछ रूसी सिपाही एक तातार गुलाम को कैदी बना कर उसकी पीठ पर हंटर बरसाते हुए ले जा रहे हैं। उसकी पीठ लहूलुहान हो उठती है, चमड़ी उधड़ जाती है फिर भी जब कोई सिपाही हंटर मारने में थोड़ी ढिलाई करता है तो वह अफसर गुस्से से चिल्ला पड़ता है ‘और जोर से हंटर मारो, नहीं तो तुम्हें मैं मजा चखाऊंगा।’ इसे देखते हुए उस अफसर का होने वाला दामाद, जिसकी पिछली रात में उसकी बेटी के साथ सगाई हुई थी और जिसके उपलक्ष्य में नाच हुआ था, का मन अपने ससुर की क्रूरता से इतना व्यथित हो उठता है कि वह उसका दामाद न बनने का फैसला कर लेता है। काउंट वर्ग का होने के बावजूद एक दलित, गुलाम तातार के प्रति उसकी हमदर्दी जाग उठती है। आज भी उस कहानी को पढ़ते हुए पाठक कोड़े की मार अपनी पीठ पर महसूस करते हुए उस रूसी अफसर के प्रति क्रोध और घृणा से भर उठते हैं। जाहिर है, यह संवेदनशीलता ही है, जो वर्ग-भेद से परे करके पाठक को एक पीड़ित, दलित गुलाम का हमदर्द बना देती है। यही करने में है साहित्य का स्वधर्म।
यही नहीं, साहित्य की संवेदनशीलता हमें कई बार मनुष्य की कठोरता, निर्दयता के बरक्स मनुष्येतर प्राणी के साथ खड़ा करती है। इस संबंध में भी प्राचीन काल से लेकर अब तक लिखित और मौखिक परंपराओं में अनेक कहानियां हैं। अज्ञेय की ‘हीली बोन की बतखें’ ऐसी ही कहानी है, जो पाठक के अंदर मनुष्येतर प्राणी के प्रति गहरी संवेदना का उद्रेक करती है। इस कहानी की नायिका हीली कुछ बत्तखें पाल और उनके अंडे बेच कर अपनी जीविका चलाती है। इसलिए जब उसकी बत्तखों के लिए एक नर-लोमड़ी खतरा बन जाती है, तो वह उसके खात्मे के लिए एक अवकाश प्राप्त फौजी कैप्टन दयाल को यह दायित्व सौंपती है। कैप्टन दयाल रात में घात लगा कर नर-लोमड़ी को गोली मार देता है। कुछ क्षणों के लिए हीली को जरूर सुकून मिलता है यह सोच कर कि बत्तखों का शिकार करने वाला जंतु मारा गया। लेकिन सुबह होते ही वह कैप्टन के साथ मारे गए जंतु के रक्त चिह्नों का अनुगमन करते हुए वहां पहुंचती है, जहां नर-लोमड़ी मरा पड़ा है और मादा लोमड़ी ‘उसके शव पर झुकी खड़ी थी, शव के सिर के पास मुंह किए मानो उसे चाटना चाहती हो और फिर सहम कर रुक जाती है। लोमड़ी के पांवों से उलझते हुए तीन छोटे-छोटे बच्चे कुनमुना रहे थे।’
यह हृदय विदारक दृश्य हीली को झकझोर देता है और उसकी खुशी गहरे अवसाद में बदल जाती है। इस जंतु-परिवार को अनाथ बनाने के अपराधबोध से ग्रसित होकर वह तेज कदमों से अपनी बत्तखों के दड़बे के पास पहुंचती है और एक-एक कर उन्हें मार डालती है। कैप्टन को शाबाशी देने के बजाय वह धिक्कारते हुए उसे ‘हत्यारा’ कहती है। साहित्य का यही स्वधर्म है, जो हमें निजी स्वार्थ-विवर से बाहर निकल कर दूसरे के प्रति भी करुणार्द्र, पर-दुखकातर होने की प्रेरणा देता है। ऐसे दृष्टांतों से साहित्य भरा पड़ा है, जो इस बात का प्रमाण है कि वही साहित्य टिकाऊ, कालजयी हो पाता है जो वर्ण, लिंग, संप्रदाय पर आधारित दरारों को पाटते हुए हमें समस्त जड़-चेतन के प्रति करुणार्द्र, संवेदनशील बनाता है, उसे अपने जैसा समझने का भावोद्रेक करता है। ईसा मसीह ने कहा है कि अपने पड़ोसी को भी अपना समझ कर प्रेम करो, तो साहित्य यह भावबोध पैदा करता है कि जिस किसी में प्राण है वह तुम्हारा पड़ोसी है, वह तुम्हारा अपना है।

