आर्य भारत
आज फिर से गीत लिखने का हुआ है मन।
आज फिर लहरा रहे हैं याद के परचम।
खुल रहे हैं बाल तारे जगमगाते हैं।
भाल पर सिंदूर के जुगनू लजाते हैं।
चल रही लहरों पे नौकाओं की शैतानी
साहिलों पर सिलवटों के दाग आते हैं।
आज फिर छूने चला है चांद को चंदन।
आज फिर से गीत लिखने का हुआ है मन।
बस अभी होठों लिया सिगरेट है मैंने।
माचिसों की तितलियां उड़ने लगी चहुं ओर।
बस अभी धुएं सी धुंधलाने लगी हो तुम।
घाटियों में पर्वतों का तन गया है पोर।
एक परछाईं से बिंबित हो उठा दर्पन।
आज फिर से गीत लिखने का हुआ है मन।
धंस गया है एक सहसा बाण मेरे देह,
गिर रहे सीकर गुलाबो की कबाओं में।
हंस की माफिक तुम्हारी गर्दनें उठ कर,
खोजती हैं मछलियां मेरी भुजाओं में।
लाख हिचकोले सरोवर में गए है थम।
आज फिर से गीत लिखने का हुआ है मन।।
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