कालनेमिः जो भज रहे हैं राम को ताकि राम को ही हरा सकें..

राघवेंद्र शुक्ल की कविताः ‘कालनेमि’

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तस्वीर साभारः पीयूष कुंवर कौशिक

तुम भक्ति में लीन रहे
जबकि तुम जरूरत थे एक महान उद्देश्य की,
कि जिसे सिर्फ तुम ही कर सकते थे।
तुम जागे तब जब तुम्हें जगाया किसी जामवंत ने।
तुम सोचो
तुम्हारे नींद की नींव पर खड़ा था
एक अभिमानी सागर का साम्राज्य।
जिसके विशाल भुजाओं के आगे
रुक गई थी राम की सेना।
तुम जागे तो धधक उठा
अभिमान का एक अजेय किला, लेकिन-
बल-बुद्धि-विद्या में अद्वितीय तुम छले क्यों गए?

काल की धारा के आधुनिक खंड में
तुमसे किसी ने नहीं कहा-
‘का चुप साधि रहा बलवाना’
लेकिन तुमने अपने अ-मौन की अपनी भाषा गढ़ी।
तुम निगल गए उनका सूरज
जो कभी न डूबने के अभिमान में मत्त था।
तुम्हारी निरपराध पूंछ में जब आग लगी
तो राख हो गई ‘अहंकार’ की लंका।
बल-बुधि-विद्या में तुम अब भी अद्वितीय हो मेरे भारतेय! लेकिन-
तुम छले क्यों गए?

तुम्हारी भक्ति निश्चय ही पावन और मासूम है
तुम्हारे वस्त्रों का रंग सुकून का रंग है।
शांति का रंग है, विश्वास का रंग है, उम्मीद का रंग है।
तुम्हारे अलंकार मानवता का श्रृंगार हैं
तुम्हारा मन निश्चय ही निर्मल है
दिए की लौ की तरह।
लेकिन तुम छले गए हनुमान की तरह
संजीवनी लाने जाते समय।
तुमने पहचाना नहीं कि जिन वस्त्रों को तुम
अराधना का प्रतीक मानते हो,
जिन मंत्रों को तुम ईश्वर के लिए स्नेहिल पुकार मानते हो
जिन प्रतीकों को तुम
ईश्वर से बातचीत की भाषा की लिपि मानते हो
उसे पहन बैठा है कोई कालनेमि,
तुम्हें छलने के लिए।
चूंकि तुम्हारी भक्ति ने
इन प्रतीकों पर संदेह की सीमा पार न करने का व्रत लिया है
इसलिए तुम छले गए।
लेकिन ये सच है कि
तुम्हारा छला जाना तुम्हारी बुद्धि-विद्या के हिस्से का अपराध नहीं है।

तुम अपने आस-पास देखो
खंजरों-तलवारों और छलों के हथियारबंदों ने
तुम्हारा रंग ओढ़ लिया है।
इसलिए कि तुम बहके रहो
और उनके आकाओं के
साम्राज्य के तख्तों के पाए मजबूत और सुरक्षित रहें।
युग के कालनेमियों से संभलो,
युग के हनुमानों!
क्योंकि वो भी राम भज रहे हैं
ताकि जीवित न बचे राम का भाई
क्योंकि वो भी राम भज रहे हैं
ताकि हरा सकें राम को।

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