शशिप्रभा तिवारी

शून्यता में पूर्णता, परमानंद, स्वर्णिम सुख और प्रेम को पाने का अहसास ही जीवन की यात्रा है। अपने व्यक्तित्व के सच की तलाश, अंर्तमन की यात्रा, आत्मावलोकन के साथ जीवन के क्षणभंगुरता को जीना। ध्यान की एक विधा यानी नृत्य, जिसमें नर्तक का जीवन घुंघरू होता है और उसकी हर सांस पैरों में बंधी घुंघरू डोर और उसकी ध्वनि पर टिकी होती है। इन्हीं भावों को नृत्यांगना गौरी दिवाकर अपनी कथक प्रस्तुति ‘शून्यता का नर्तन’ में पेश किया। इसकी नृत्य परिकल्पना कथक नृत्यांगना व गुरु अदिति मंगलदास ने और परिकल्पना के संगीत को सुरों में गायक भुवनेश कोमकलि ने पिरोया।

दरअसल, कथक नृत्यांगना गौरी दिवाकर की यह प्रस्तुति दार्शनिक जे कृष्णमूर्ति के विचारों से प्रभावित है। कृष्णमूर्ति का मानना था कि ‘ध्यान’ विचारों की आवाजाही से मुक्ति पाना और परमानंद में डूब जाना है। यह निरंतर खोज की प्रक्रिया गौतम बुद्ध और संत कबीर के विचारों से भी प्रभावित थी। इसी तलाश को गुरु अदिति मंगलदास ने नृत्य परिकल्पना में परिकल्पित किया और नृत्यांगना गौरी ने मंच पर साकार किया।

इस प्रस्तुति का आगाज गौरी ने रचना ‘भक्ति मार्ग जीना रे’ पर आधारित नृत्य से किया। इसमें उन्होंने सोने के डोर को प्रतीक के तौर पर दर्शाया। नृत्य के भाव का सार था कि भक्ति ही जीवन के हर चीज से जुड़ी है। इस तरह नृत्यांगना का नृत्य भी भक्ति का ही एक मार्ग है। अगले अंश में कबीर के दोहे ‘चल हंसा वा देस जहां बसा चितचोर’ पर भावों को गौरी ने बखूूबी दर्शाया। यहां हंसा आत्मा का प्रतीक रूप था।

नृत्य को प्रभावकारी बनाने में स्वर्णिम रोशनी का प्रतीकात्मक प्रयोग भी मनोहारी था। नृत्य की पराकाष्ठा एक अन्य रचना में बखूबी होती है। इसके बोल थे-‘घूंघट के पट खोल रे, तोहे पिया मिलेंगे’।  इस रचना को वैसे तो बहुत से कलाकारों ने गाया है, पर जिस अंदाज में गायक भुवनेश कोमकलि ने गाया, वह अपना अलग ही प्रभाव छोड़ रहा था। उसी अनुरूप भावों का विवेचन गौरी ने पेश किया, जो कथक नृत्य में कम ही देखने को मिलता है। संगीत के सुर-लय के साथ नृत्य के संचारी भावों का यह संयोग प्रभावकारी था। कुल मिलाकर दोनों ही कलाकारों की आपसी साझेदारी सराहनीय थी। वैसे भी आजकल युवा कलाकारों में इस तरह की साझेदारी और प्रयोग करने का प्रयास कम ही देखने को मिलता है।