राष्ट्रीय बालिका दिवस के मौके पर देशभर में लड़कियों के अधिकारों और सुरक्षा पर चर्चा हुई। इस बीच राजधानी दिल्ली में एक ऐसा मंच सजा जहां लड़कियों ने चुप रहने से इनकार किया। गैर-लाभकारी संस्था मुक्कामार ने YMCA ऑडिटोरियम में अपनी विशेष पहल ‘ZIDD: Voices of Resistance’ पुस्तक का प्री-लॉन्च किया।

रोजमर्रा की हिंसा और सवाल उठाने की हिम्मत

यह एक ऐसा संग्रह है जो किशोरियों की वास्तविक अनुभवों से प्रेरित कहानियों के जरिए रोजमर्रा की हिंसा, सवाल उठाने की हिम्मत और प्रतिरोध की छोटी-छोटी, लेकिन ताकतवर आवाजों को सामने लाता है। कार्यक्रम में पुलिस, सरकार और बाल-अधिकार क्षेत्र के वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने एक अहम सवाल पर मंथन किया, क्या हम सचमुच उन लड़कियों के लिए तैयार हैं, जो बोलने का साहस करती हैं?

किशोरियों का साहस दर्शाती किताब

ऐसे समय जब महिलाओं की सुरक्षा पर बातचीत में अक्सर लड़कियों की वास्तविकताओं को नजरअंदाज कर दिया जाता है, ‘ZIDD: Voices of Resistance’ किताब वास्तविक जीवन के अनुभवों से प्रेरित कहानियों के जरिये किशोर लड़कियों की हिंसा के सामने प्रतिरोध, सवाल उठाने और रोजमर्रा के साहस के कार्यों को दर्शाती है।

इस चर्चा में कानून प्रवर्तन, सरकार और बाल अधिकार इकोसिस्टम के वरिष्ठ लोगों को एक साथ लाया गया ताकि सामूहिक रूप से एक अहम सवाल पर विचार किया जा सके, कि क्या हम व्यक्तिगत और संस्थागत रूप से, बोलने वाली लड़कियों के लिए तैयार हैं?

हिंसा को फिर से परिभाषित करने की जरूरत: IAS रश्मि सिंह

इस कार्यक्रम में बोलते हुए, डॉ. रश्मि सिंह (IAS) ने आत्मरक्षा के लिए मुक्कामार के नए दृष्टिकोण के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा, ‘हमें हिंसा को फिर से परिभाषित करने की जरूरत है। इसे केवल शारीरिक नुकसान तक सीमित नहीं किया जा सकता। मानसिक और भावनात्मक हिंसा भी उतनी ही वास्तविक और हानिकारक है।’

दशकों बाद भी पर्याप्त बदलाव नहीं दिखता: IPS अजय चौधरी

विशेष पुलिस आयुक्त अजय चौधरी (IPS) ने कानूनी सुधारों के बावजूद हिंसा के बने रहने पर विचार किया। अजय चौधरी ने कहा, ‘अपनी सेवा के पिछले 15 वर्षों में मैंने ऐसी हजारों कहानियां सुनी हैं। दशकों बाद भी, हमें पर्याप्त बदलाव नहीं दिखता। बदलाव केवल सामूहिक चेतना बढ़ाकर ही आ सकता है। निर्भया के बाद, युवाओं के विरोध प्रदर्शनों से फास्ट-ट्रैक कोर्ट और कानूनों में बदलाव हुए। अगर आप चुनौती नहीं देंगे, तो आपकी बात नहीं सुनी जाएगी। बोलना पड़ेगा। आप चुप नहीं रह सकते।’

आंगन का नेतृत्व करने वाली अतिया बोस ने इस बात पर जोर दिया कि समाज सुरक्षा को कैसे देखता है, इसे फिर से परिभाषित करने की ज़रूरत है। उन्होंने कहा, ‘हम सुरक्षा को एक सार्वजनिक वस्तु के रूप में नहीं देखते; हम इसे एक निजी चिंता के रूप में देखते हैं। हम सुरक्षा बुनियादी ढांचे की मांग उस तरह से नहीं करते जिस तरह से हमें करनी चाहिए। सुरक्षा एक मौलिक अधिकार है।

हिंसा के प्रति सहनशीलता कम करने की जरूरत: एक्ट्रेस इशिता

समाज में हिंसा के बारे में बात करते हुए, एक्ट्रेस और मुक्कामार की फाउंडर और CEO इशिता शर्मा ने कहा, ‘हमें हिंसा के प्रति अपनी सहनशीलता कम करने की जरूरत है। हम अक्सर सिर्फ यौन उत्पीड़न को ही पहचानते हैं, लेकिन लड़कियों को सभी तरह की हिंसा के बारे में बोलने के लिए सपोर्ट महसूस होना चाहिए।’

इशिता शर्मा ने किताब में कहानियों पर प्रकाश डालते हुए रोजाना की हिंसा का विरोध करने वाली लड़कियों के साहस पर जोर दिया। इशिता शर्मा ने कहा, ‘लड़कियां बहुत जल्दी सीख जाती हैं कि उनके पास सिर्फ दो ही विकल्प हैं। ‘अच्छी’ बनें या ‘सुरक्षित’ रहें। इस किताब की लड़कियां उस विकल्प को मना करती हैं। वे चुपचाप हिंसा को सामान्य रूप से बर्दाश्त करने से इनकार करती हैं।’

सामाजिक मानदंडों को बदलने की जरूरत

अलग-अलग सेक्टर्स के बीच सहयोग का आह्वान करते हुए, पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ़ इंडिया की कार्यकारी निदेशक पूनम मुतरेजा ने लड़कियों की सुरक्षा और प्रतिरोध को मजबूत करने के लिए सामाजिक मानदंडों को बदलने और सामूहिक जिम्मेदारी बनाने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने दिल्ली भर में सुरक्षा को आगे बढ़ाने के लिए सभी स्टेकहोल्डर्स से एक साथ आने का भी आह्वान किया।

कार्यक्रम में इस पर जोर दिया गया कि लड़कियों के लिए सुरक्षित भविष्य बनाने के लिए उनकी आवाजों और अनुभवों को पॉलिसी, प्रैक्टिस और संस्थागत प्रतिक्रियाओं में केंद्र में रखने की जरूरत है।