इंसान यूं तो जहां पैदा होता है वहां का होता है, है न। लेकिन अचानक कोई आकर कहे तुम यहां के नहीं हो, वो सोचने लग जाता है कि मैं कहां का हूं शायद कहीं का नहीं या फिर उस जगह का हूं जो जगह दुनिया में कहीं नहीं।’ साढ़े नौ मिनट का प्रेमपत्र नागरिकता संशोधन कानून से लेकर रोहित वेमुला के न होने तक की संघर्ष यात्रा का चलचित्र बन जाता है। एक छोटी सी चिट्ठी इतिहास में दखल देती दिखती है। नीरा जलछत्री की लघु फिल्म ‘द लास्ट लेटर’ कैमरे से कलम का काम लेती है।

हिंदी में बनी इस फिल्म की शुरुआत होती है चिट्ठी लिखने से। इस चिट्ठी में समय का बोध एक तो पल और क्षण का है, जहां मनुष्य बदलता रहता है। दूसरा बोध है इतिहास का। इस क्षण में जो आज हम हैं और जो पहले थे इसके बीच जो है वह इतिहास है। यह इतिहास नागरिकता संशोधन कानून से गुजरते हुए, रोहित वेमुला को चाय की तरह खौलते हुए देखता है। फिल्म में टपरी के पास चूल्हे पर खौलती चाय प्रतीक है। हमारे अंदर चीजें खौल रही हैं, शायद एक दिन इसी तरह से उबाल आ जाएगा। घूंट-घूंट पीने का प्रतीक हमारा तैयार होना है। प्रेमी को याद करते हुए दरख्त को गले लगाना, इतिहास को गले लगाने की तरह है। परिवर्तन का नाम इतिहास है। लेकिन यह परिवर्तन सबके लिए एक साथ और एक जैसा नहीं हुआ। परिवर्तन में परिधि पर खड़े ठेला चलाने वाले, कूड़ा उठाने वाले का क्या हुआ? उस शख्स का क्या हुआ जो कचरा गाड़ी लेकर घूम रहा है। परिवर्तन के बाद इतिहास में वो वहीं खड़ा है तो क्या उसके अंदर कुछ खौल नहीं रहा होगा? उबाल नहीं आ रहा होगा? और जब उबलेगा तब?

सिनेमा कहानी या कविता से अलग माध्यम है। नीरा सिनेमा के जरिए काव्यात्मक अभिव्यक्ति करती हैं तो उनकी नजर बड़े फलक पर जाती है। प्रेमिका के पत्र में सवाल है कि हमसे पूछा जाएगा कि तुम कौन हो, किस देश से हो। प्रेम में डूबा मन दमित और दमन के बीच के रिश्ते की पड़ताल करता है। वह फारसी में रूमी का कलाम लिखती है, यह जानने के बावजूद कि आज के समय में फारसी सबसे डरावनी भाषा है। अब वो राजनीति समझती है उससे डरती नहीं। प्रेम में निडर होकर दुनिया को जानना, समझना। कलम से लिखी जा रही कविता को सिनेमा में बदलने का यह रचनात्मक तजुर्बा है। इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है कि यह काव्यात्मक अभिव्यक्ति है। कविता में डिटेल्स नहीं होते हैं। इसमें पाठक या श्रोता के लिए भी रचनात्मक जगह छोड़ी जाती है जिसमें घुस कर वो खुद को व्याप्त करे।

आत्मकेंद्रीयता से आगे: नीरा

सिनेमा बनाने की खलिश पीएचडी के दौरान पैदा हुई। उस दौरान सिनेमा पर काम करते हुए कई बार महसूस किया कि ये बात यूं न कहकर, यूं कही जाती तो बेहतर होता। उन्हीं दिनों बेहतरीन निर्देशकों की विचार प्रक्रिया को जाना। इस बीच, कई लोगों से मिली कुछ दूसरी योजनाओं के साथ, लेकिन कुछ बात बनी नहीं।

आखिकार लगा अपनी कहानी आपको खुद ही कहनी पड़ेगी। इस खयाल ने ही सिनेमा निर्माण की बुनियाद सीखने के लिए प्रेरित किया। एक हफ्ते की कार्यशाला में जितना सीख पाई उसी से यह फिल्म बनाई है। हालांकि ये पहले से ही सोच रखा था कि पहली शॉर्ट फिल्म ही बनाऊंगी। हिंदी सिनेमा में स्त्री की जो छवि लंबे वक्त से बनाई गई है, उसमें दुहराव बहुत है। आज भी कुछ-एक फिल्में उसे तोड़ने की कोशिश करती हुई लगती हैं, लेकिन उसमें भी अधिकांश मामला देह विमर्श से आगे नहीं बढ़ पाता है, या फिर उसमें उकेरी गई स्त्री बहुत महत्वकांक्षी है, आत्मकेंद्रित है जबकि ऐसी महिलाओं की संख्या भी काफी है जिन्हें अपने आस-पास की चीजों, घटनाओं, सामाजिक और राजनैतिक उथल-पुथल से फर्क पड़ता है।

ये घटनाएं उन्हें लगातार भीतर से बदल रही होती हैं। लेकिन ऐसी स्त्री पर्दे पर गायब है। यह एक बड़ी कमी है। इस खालीपन को भरना सिन्मा के परदे पर स्त्री के वास्तविक प्रतिनिधित्व को दर्ज कराने जैसा है।