human sensitivity, dying compassion, power of words
दुनिया मेरे आगे: अब ‘हत्या’ सुनकर दिल नहीं कांपता, हृदय विदारक शब्द अब सामान्य लगने लगे हैं — यही सबसे बड़ा खतरा है

जनसत्ता अखबार के स्तम्भ ‘दुनिया मेरे आगे’ में आज पढ़ें मोहम्मद जुबैर के विचार।

tree cutting, environment loss, global warming
दुनिया मेरे आगे: पंछियों का शोकगीत- जब पेड़ कटता है तो धरती रोती है; हरियाली की करुण कहानी

जनसत्ता अखबार के स्तम्भ ‘दुनिया मेरे आगे’ में आज पढ़ें गिरीश पंकज के विचार।

दुनिया मेरे आगे: अब कोई ‘सत्य वचन महाराज’ नहीं, तर्क के युग में हर नागरिक बन गया है विचारक; लोगों की सोच में बड़ा बदलाव

जनसत्ता अखबार के स्तम्भ ‘दुनिया मेरे आगे’ में आज पढ़ें राजेंद्र बज के विचार।

crime news| crime
दुनिया मेरे आगे: अब गालियां बन गईं फैशन की जुबान, अच्छे कपड़े पहनकर बुरे शब्द बोलने से नहीं बढ़ता सोशल स्टेटस

जनसत्ता अखबार के स्तम्भ ‘दुनिया मेरे आगे’ में आज पढ़ें नरेंद्र सिंह ‘नीहार’ के विचार।

Diary writing, self reflection, social media impact
दुनिया मेरे आगे: जब मन के शब्द कागज पर उतरकर बनते थे यादें, ‘लाइक्स’ की दुनिया में छूट गई डायरी लिखने की आदत

जनसत्ता अखबार के स्तम्भ ‘दुनिया मेरे आगे’ में आज पढ़ें सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ के विचार।

true relationships, emotional distance, loneliness in relationships
दुनिया मेरे आगे: जीवन छोटा है, और इसे केवल उन रिश्तों में जीना चाहिए, जहां हमें अजनबी नहीं, बल्कि सबसे करीबी माना जाए

जनसत्ता अखबार के स्तम्भ ‘दुनिया मेरे आगे’ में आज पढ़ें हरिओम हंसराज के विचार।

modern motherhood, working mothers, technology and parenting
दुनिया मेरे आगे: मां 2.0- तकनीक, करियर और ममता का नया संतुलन, बदलते दौर की नई पाठशाला

जनसत्ता अखबार के स्तम्भ ‘दुनिया मेरे आगे’ में आज पढ़ें रितुप्रिया शर्मा के विचार।

Importance of creativity, creativity and life, creativity
दुनिया मेरे आगे: सोचिए आखिरी बार आपने क्या नया सोचा था? वह जीवन क्या जब हर दिन कुछ नया न सोचें, न करें

जनसत्ता अखबार के स्तम्भ ‘दुनिया मेरे आगे’ में आज पढ़ें शिशिर शुक्ला के विचार।

Conquer Fear, Build Confidence, Jonathan Livingston Seagull
दुनिया मेरे आगे: क्या आप भी डर के कारण पीछे रह जाते हैं? जोनाथन सीगल से सीखिए कामयाब होने का सही तरीका

जनसत्ता अखबार के स्तम्भ ‘दुनिया मेरे आगे’ में आज पढ़ें शिखर चंद जैन के विचार।

Clay toys, Diwali tradition, potters, clay lamps, folk culture, Indian festivals
दुनिया मेरे आगे: कभी गांवों की गलियों में मिट्टी की खुशबू और खिलौनों की हंसी से सजती थी दिवाली, अब प्लास्टिक की चमक में खो गई परंपरा?

जनसत्ता अखबार के स्तम्भ ‘दुनिया मेरे आगे’ में आज पढ़ें सुभाष चंद्र कुशवाहा के विचार।

Diwali meaning, inner light, spiritual Diwali, mind cleansing
दुनिया मेरे आगे: इस बार दिवाली थोड़ी अलग तरह से मनाएं, सेल्फी कम, सेल्फ-रियलाइजेशन ज्यादा करें; सारी कड़वाहट दूर कर मन को हल्का और साफ बनाएं

जनसत्ता अखबार के स्तम्भ ‘दुनिया मेरे आगे’ में आज पढ़ें रेखा शाह आरबी के विचार

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दुनिया मेरे आगे: कॉलेज कैंपस बनते जा रहे हैं चुनावी मैदान, क्या अब राजनीति के अखाड़े बन गए है विश्वविद्यालय

जनसत्ता अखबार के स्तम्भ ‘दुनिया मेरे आगे’ में आज पढ़ें नीलम सिंह के विचार

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