Social media hate speech, online hate and intolerance
दुनिया मेरे आगे: कुछ बातें भूल जाइए, कुछ लोगों को माफ कर दीजिए, मन भी हल्का होगा, जिंदगी भी

जनसत्ता अखबार के स्तम्भ ‘दुनिया मेरे आगे’ में आज पढ़ें डॉ गौरव बिस्सा के विचार।

Humanity, compassion, ruthlessness
दुनिया मेरे आगे: पैसा, ताकत और अहंकार से भयानक होते जा रहे हैं हम, जीवन की यह कैसी सुबह हो रही है?

जनसत्ता अखबार के स्तम्भ ‘दुनिया मेरे आगे’ में आज पढ़ें गिरीश पंकज के विचार।

दुनिया मेरे आगे: एक और साल बना इतिहास, यादों की गठरी के साथ समय ने फिर सिखाया- जीवन कभी ठहरता नहीं

जनसत्ता अखबार के स्तम्भ ‘दुनिया मेरे आगे’ में आज पढ़ें अनिता वर्मा के विचार।

Dunia Mere Aage
दुनिया मेरे आगे: नया साल केवल तारीख नहीं, सोच बदलने और जिंदगी को नई शुरुआत देने का अवसर है; कुछ भूलें और कुछ नया करें

मोनिका राजजनसत्ता अखबार के स्तम्भ ‘दुनिया मेरे आगे’ में आज पढ़ें मोनिका राज के विचार।

दुनिया मेरे आगे: लखनऊ में गमले उठाते ‘सभ्य’ लोग: क्या सार्वजनिक नैतिकता हमारे विकास से पीछे छूट गई है?

जनसत्ता अखबार के स्तम्भ ‘दुनिया मेरे आगे’ में आज पढ़ें शिवम भारद्वाज के विचार।

Success, अस्वीकृति का प्रभाव, अस्वीकृति का दर्द, आत्मसम्मान और अस्वीकार
दुनिया मेरे आगे: अस्वीकृति के मायने, ‘नहीं’ वास्तव में किसी और चीज के लिए ‘हां’ है

अस्वीकृति के बोझ तले हम दब गए हैं। शुरुआत में अस्वीकृतियां चुभती-सी महसूस होती हैं। ऐसा लगता है कि सिर्फ…

Philosophy of life, suffering and self-awareness
दुनिया मेरे आगे: दर्द किसी को मजबूत बनाता है, किसी को तोड़ देता है; किस बात का है फर्क?

जनसत्ता अखबार के स्तम्भ ‘दुनिया मेरे आगे’ में आज पढ़ें रामानुज पाठक के विचार।

Inner Journey
दुनिया मेरे आगे: क्या अनुभव आपको डरा रहे हैं? जीवन बाहरी घटनाओं की भीड़ नहीं, डर से आजादी की ओर एक आंतरिक यात्रा है

जनसत्ता अखबार के स्तम्भ ‘दुनिया मेरे आगे’ में आज पढ़ें मनीषा मंजरी के विचार।

Power of solitude, Self-reflection, Emotional balance, Mindfulness Hindi, रचनात्मकता, मानसिक शांति, कल्पना का महत्व
दुनिया मेरे आगे: खयालों में खोना वक्त की बर्बादी नहीं, आत्मा के सांस लेने जैसा है; जानिए व्यस्तता के बीच क्यों जरूरी है एकांत?

जनसत्ता अखबार के स्तम्भ ‘दुनिया मेरे आगे’ में आज पढ़ें पवन शर्मा के विचार।

Fast-paced life, the illusion of time, digital distractions-Dunia mere aage
दुनिया मेरे आगे: रील वाली रफ्तार में कहीं छूट न जाए असली जिंदगी, स्क्रीन के पीछे का संघर्ष भी पहचानिए

जनसत्ता अखबार के स्तम्भ ‘दुनिया मेरे आगे’ में आज पढ़ें एकता कानूनगो बक्षी के विचार।

Loneliness in Crowd, Modern Life, Relationships Today
दुनिया मेरे आगे: सोशल मीडिया पर हजार संपर्क, फिर भी अकेलापन; भीड़ के दौर में रिश्तों का सच

जनसत्ता अखबार के स्तम्भ ‘दुनिया मेरे आगे’ में आज पढ़ें हरिओम हंसराज के विचार।

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