जनसत्ता एक्सकलूसिव: नोटबंदी की ज़मीनी हकीकत

*जनसत्ता पड़ताल..*

*नोटों से हाल बेहाल..*

देशभर में नोटबंदी के बाद हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। हर बैंक के बाहर हजारों की संख्या में लोगों की भीड़ साफ़ देखी जा सकती है जिसे संभालना पुलिस और प्रशासन के लिये काफी मुश्किल साबित हो रहा है।

इस मामले पर जब जनसत्ता ने पड़ताल की तो जमीनी हकीकत का पता चला।

हम हैं मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड अंचल में जहाँ छतरपुर जिले में हमने हालातों का जायज़ा लिया। रोजमर्रा और मेडिकल दुकानों पर नोट न चलने की वजह से लोग इलाज नहीं करवा पा रहे हैं।

ये हैं जिला अस्पताल के महिला वार्ड में भर्ती 26 वर्षीय रचना जिन्होंने हाल ही में 1 बेटे को जन्म दिया है। जिसके बाद से ही रचना और उनके बच्चे का स्वस्थ्य खराब है। बाजार में 1000-500 के नोट न चलने की वजह से इनके पति नोट बदलने के चक्कर में बैंक के बाहर लाईन में लगे रहते हैं। सुबह से शाम हो जाती है तब कहीं जाकर 2500 के नोट बदल पाते हैं।

छतरपुर की ही रहने वाली 29 साल की अरुणा तिवारी सुबह से SBI बैंक ब्बाहर लाईन में लगी हुई हैं। जब से नोटबंदी का फरमान आया है अक्सर इनकी 4 साल की बेटी स्कूल नहीं जा पा रही है। पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते अरुणा को परिस्थितियों से संघर्ष करना पड़ रहा है। नोट बदलने के लिये दिन भर लाईन में लगना पड़ता है।

ये हैं 28 साल की पार्वती। नोट बदलने के लिए सुबह 7 बजे से बैंक के बाहर लाईन में लग गईं थीं अब दोपहर के 3 बज चुके हैं। अब तक इनका नंबर नहीं आ पाया है। दिन भर से भूखी प्यासी है। लाईन तोड़कर पानी पिने तक नहीं जा सकतीं वर्ना नंबर चला जायेगा। घर में इनके दोनों बच्चे अकेले और बीमार हैं। बैंक से पैसे बदल जाएँ तब कहीं जाकर उनका इलाज कराया जा सके।

वहीँ इस सब के बीच छतरपुर शहर की एक समाजसेवी संस्था बैंकों और ATM के बाहर लाईन में लगे लोगों को खाने पीने का सामान बांट रही है ताकि लोगों को थोड़ी राहत दी जा सके।

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