दिल्‍ली के मशहूर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) ने प्रवेश के लिए सीटों की संख्‍या में भारी कटौती की है। विश्‍वविद्यालय ने पीएचडी/एमफिल की सीटें 1,048 से घटाकर सिर्फ 130 कर दी हैं। 64 सीटें डायरेक्‍ट पीएचडी के लिए रखी गई हैं। जेएनयू छात्र संघ ने आरोप लगाया है कि हाई कोर्ट के आदेश के बाद एडमिशन के लिए जो प्रास्‍पेक्‍टस जारी किया गया है, उसके हिसाब से पीएचडी और एमफिल की सीटों की संख्या पिछले सालों के मुकाबले बेहद कम कर दी गई हैं। जेएनयू ने मई 2016 में यूजीसी की ओर से जारी गजट अधिसूचना के आधार पर एमफिल-पीएचडी में दाखिले के लिए प्रवेश प्रक्रिया बनाई है। छात्र संघ के प्रतिनिधियों का कहना है कि जब तक यूजीसी अपनी अधिसूचना को वापस नहीं ले लेता है तब तक हमारा विरोध जारी रहेगा। जेएनयू के कई केंद्रो में इस बार एमफिल-पीएचडी में एक ही सीट पर प्रवेश होगा। इनमें यूरोप अध्ययन केंद्र, दक्षिण एशिया अध्ययन, पीएचडी इन विजुएल स्टडीज, पीएचडी इन थियेटर एंड परफोर्मेंशन स्टडीज और पीएचडी इन सिनेमा स्टडीज शामिल हैं।

जेएनयू के इस कदम को लेकर फेसबुक पर कड़ी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। विभिन्‍न छात्र संगठनों से जुड़े लोगों व छात्रों ने इस कदम को शिक्षा के लिए बेहद खराब बताया है। अमित ने लिखा है, ”एमफिल, पीएचडी की सीटजेएनयू में 83 फीसदी घटा दी गयी है। देश को बौद्धिक रूप से अपंग कर देने की शुरुवात भर है ये। आप वोट देकर मन बढ़ाते रहिये।”

एबीवीपी के ललित पांडेय ने लिखा है, ”वामपंथी विचारधारा से आने वाले “कॉमरेड इन फैकल्टी” की गहरी साजिश से जेएनयू में सीट कटौती हो रही है। जब जेएनयू में एबीवीपी यूजीसी गैजट नोटिफिकेशन के खिलाफ सामाजिक और राजनैतिक लड़ाई लड़ रही थी तो आखिर क्या जरूरत थी हाई कोर्ट जाने की। वहाँ जाकर डेप्रीवेशन प्वाईंट और क्वार्टाइल प्वाईंट हटवा दिया। क्या जाने से पहले All-Org. Meeting करायी गई और आम सहमति बनाने की कोशिश क्यों नहीं की गई??”

जेएनयू में प्रवेश की अधिसूचना के मुताबिक एमफिल-पीएचडी में प्रवेश लेने वाले किसी भी उम्मीदवार को डिप्राइवेशन अंक नहीं दिए जाएंगे। ये अंक स्नातक और स्नातकोत्तर में दाखिला लेने वाले छात्रों को ही मिलेंगे। जेएनयू देश के पिछड़े जिलों से आने वाले छात्रों को प्रवेश में आरक्षण देता है और इसके लिए उन्हें डिप्राइवेशन अंक दिए जाते हैं जो अधिकतम 12 हो सकते हैं।