Hans Christian Gram (हान्स क्रिश्चियन ग्रैम) Google Doodle: गूगल ने आज एक खास डूडल बनाया है। यह डूडल गूगल ने डेनिश माइक्रोबायोलॉजिस्ट हान्स क्रिश्चियन ग्रैम के 166वें जन्मदिन पर बनाया है। हान्स क्रिश्चियन ग्रैम को ग्राम स्टेन के लिए जाना जाता है। Google डूडल को डेनिश आर्टिस्ट मिकेल सोमर ने तैयार किया है, और इसमें हान्स क्रिश्चियन ग्रैम के ग्रैम स्टेन पर किए गए काम को दिखाया गया है। हंहान्स क्रिश्चियन ग्रैम का जन्म 13 सितंबर को 1853 में कोपेनहेगन में हुआ था। हान्स क्रिश्चियन ग्रैम ने 1878 में कोपेनहेगन यूनिवर्सिटी से एमडी किया और फिर जीवाणु विज्ञान और फार्माकोलॉजी की पढ़ाई करने के लिए यूरोप चले गए।
इस दौरान बर्लिन में एक माइक्रोबायोलॉजिस्ट लैब में काम करते हुए, उन्होंने देखा कि क्रिस्टल वायलेट से बैक्टीरिया के स्मीयर का इलाज किया गया था, जिसके बाद एक आयोडीन सॉल्यूशन और एक ऑर्गेनिक सॉलवेंट से अलग अलग सेंपल्स की संरचना और बायोकैमिकल फंग्शन में अंतर का पता चला। साल 1878 से लेकर 1885 में इन्होंने यूरोप की यात्रा की, इसके बाद बर्लिन में 1884 में बैक्टीरिया के वर्गीकरण करने का तरीका निजात किया। 14 नवंबर 1938 को इनकी मृत्यु हो गई।
Hans Christian Gram (हान्स क्रिश्चियन ग्रैम) Google Doodle


इसका मुख्य फायदा यह है कि डॉक्टर को आसानी से बैक्टीरियल इन्फेक्शन का पता चल जाता है। यह भी पता चल जाता है कि किस प्रकार का बैक्टीरिया आपको परेशान कर रहा है। फिर डॉक्टर को सही इलाज करने में मदद मिलती है।
अगर आपका ग्रैम स्टेन टेस्ट नेगेटिव रहता है तो इसका मतलब है कि आपके सैंपल में बैक्टीरिया नहीं पाया गया है। अगर पॉजिटिव है तो इसका मतलब बैक्टीरिया मौजूद है। कुल मिलाकर इस तकनीक से बैक्टीरिया की मौजूदगी या गैर मौजूदगी, उनके गुणधर्म आदि के बारे में पता चल जाता है।
अगर बैक्टीरिया मौजूद है तो कौन सा बैक्टीरिया, ग्रैम पॉजिटिव या ग्रैम नेगेटेवि मौजूद है। फिर डॉक्टर उसके मुताबिक आपका उपचार करता है।
ग्रैम स्टेंस टेस्ट खून, टिशू, मल, यूरीन और थूक का होता है। डॉक्टर आपसे इन चीजों कै सैंपल लेकर लैब में जांच करने के लिए भेज देता है। वहां खास स्टेनिंग तकनीक का इस्तेमाल करके एक टेक्निशन सैंपल की जांच करता है और पता लगाता है कि बैक्टीरिया मौजूद है या नहीं।
अगर आप डॉक्टर के पास जाते हैं और उनको लगता है कि आप बैक्टीरियल इन्फेक्शन से पीड़ित हैं तो वह आपकी जांच करवा सकते हैं।
स्टेनिंग टेक्निक में बैक्टीरिया के नमूने पर वायलट डाई डालकर उसे आयोडीन सलूशन से धो दिया जाता है। इस प्रक्रिया के बाद ग्रैम पॉजिटिव बैक्टीरिया पर्पल रंग के ही रहते हैं जबकि ग्रैम नेगेटिव बैक्टीरिया रंगविहीन हो जाते हैं यानी उनका कोई रंग नहीं रहता है।
बैक्टीरिया के दो समूह होते हैं। एक समूह को ग्रैम पॉजिटिव और दूसरे को ग्रैम नेगेटिव कहा जाता है। ग्रैम पॉजिटिव बैक्टीरिया कई बीमारियों का कारण होते हैं जबकि ग्रैम नेगेटिव की कुछ प्रजातियां तो बीमारी फैलाती हैं लेकिन कुछ बैक्टीरिया द्वारा फैलाए गए रोगों से लड़ती हैं।
बैक्टीरिया के दो समूह होते हैं। एक समूह को ग्रैम पॉजिटिव और दूसरे को ग्रैम नेगेटिव कहा जाता है। ग्रैम पॉजिटिव बैक्टीरिया कई बीमारियों का कारण होते हैं जबकि ग्रैम नेगेटिव की कुछ प्रजातियां तो बीमारी फैलाती हैं लेकिन कुछ बैक्टीरिया द्वारा फैलाए गए रोगों से लड़ती हैं।
बैक्टीरिया के दो समूह होते हैं। एक समूह को ग्रैम पॉजिटिव और दूसरे को ग्रैम नेगेटिव कहा जाता है। ग्रैम पॉजिटिव बैक्टीरिया कई बीमारियों का कारण होते हैं जबकि ग्रैम नेगेटिव की कुछ प्रजातियां तो बीमारी फैलाती हैं लेकिन कुछ बैक्टीरिया द्वारा फैलाए गए रोगों से लड़ती हैं।
अगर आपका ग्रैम स्टेन टेस्ट नेगेटिव रहता है तो इसका मतलब है कि आपके सैंपल में बैक्टीरिया नहीं पाया गया है। अगर पॉजिटिव है तो इसका मतलब बैक्टीरिया मौजूद है। कुल मिलाकर इस तकनीक से बैक्टीरिया की मौजूदगी या गैर मौजूदगी, उनके गुणधर्म आदि के बारे में पता चल जाता है।
खास स्टेनिंग तकनीक का इस्तेमाल करके एक टेक्निशन सैंपल की जांच करता है और पता लगाता है कि बैक्टीरिया मौजूद है या नहीं। अगर बैक्टीरिया मौजूद है तो कौन सा बैक्टीरिया, ग्रैम पॉजिटिव या ग्रैम नेगेटेवि मौजूद है। फिर डॉक्टर उसके मुताबिक आपका उपचार करता है।
अगर आप डॉक्टर के पास जाते हैं और उनको लगता है कि आप बैक्टीरियल इन्फेक्शन से पीड़ित हैं तो वह आपकी जांच करवा सकते हैं। ग्रैम स्टेंस टेस्ट खून, टिशू, मल, यूरीन और थूक का होता है। डॉक्टर आपसे इन चीजों कै सैंपल लेकर लैब में जांच करने के लिए भेज देता है।
स्टेनिंग टेक्निक में बैक्टीरिया के नमूने पर वायलट डाई डालकर उसे आयोडीन सलूशन से साफ किया जाता है। जब ये प्रक्रिया समाप्त हो जाती है तो ग्रैम पॉजिटिव बैक्टीरिया पर्पल कलर के ही रहते हैं जबकि ग्रैम नेगेटिव बैक्टीरिया का कोई रंग(रंगहीन) नहीं रहता है।
बैक्टीरिया के दो समूह ग्रैम पॉजिटिव और ग्रैम नेगेटिव होते हैं। ग्रैम पॉजिटिव बैक्टीरिया के कारण कई बीमारियों होती हैं और ग्रैम नेगेटिव में ऐसा नहीं हैं, इसमें कुछ प्रजातियां बीमारी फैलाती तो ही हैं लेकिन कुछ बैक्टीरिया द्वारा फैलाए गए रोगों को दूर भी करती हैं।
इस तकनीक के जरिए डॉक्टर को आसानी से बैक्टीरियल इंफेक्शन का पता चल जाता है। इसके अलावा किस तरह का बैक्टीरिया आपको परेशान कर रहा है, उसका भी पता चल जाता है। जिसके बाद डॉक्टर सही इलाज कर सकते हैं।
1884 में चिकित्सा जगत की ये क्रांतिकारी तकनीक विकसित हुई। उन दिनों वे वह बर्लिन के सिटी हॉस्पिटल में काम कर रहे थे और उनके साथ जर्मनी के माइक्रोबायॉलजिस्ट कार्ल फ्रीडलैंडर भी थे।
ग्रैम स्टेनिंग तकनीक का इस्तेमाल माइक्रोबायोलॉजी के इतिहास में उनकी मौत के बाद भी किया जाता रहा। उनके द्वारा इजाद की गई इस तकनीक का इस्तेमाल आज भी बायोल़ॉजी स्टूडेंट के द्वारा प्रयोगशाला में किया जाता है।
ग्रैम बी.ए. कोपेनहेगन, डेनमार्क में कोपेनहेगन मेट्रोपॉलिटन स्कूल में नेचुरल साइंस के लिए तैयार थे। उन्होंने स्थानीय चिड़ियाघर में वनस्पति विज्ञान में एक रिसर्च असिस्टेंट के रूप में भी काम किया, जिसने मेडिकल में उनकी रुचि पैदा की। ग्रैम ने 1878 में कोपेनहेगन यूनिवर्सिटी से एमएड किया।
उनकी नेमसेक स्टेनिंग तकनीक माइक्रोबायोलॉजी में एक बड़ी खोज साबित हुई। इस तकनीक में ग्रैम स्टेन मैथड के जरिए बैक्टीरिया का पता लगाने की कोशिश की जाती है। बैक्टीरिया के उपर एक पर्पल मोटी परत होती है और उन्हें ग्रैम पॉजीटिव कहा जाता है जबकि पतली परत वाले बैक्टीरिया को ग्रैम नेगेटिव के नाम से जाना जाता है।
हान्स क्रिश्चियन ग्रैम ने अपने शहर में ही एक लोकल सिविक हॉस्पीटल में जनरल फिजिशियन के तौर पर मेडिकल में करियर की शुरूआत की थी।
हान्स क्रिश्चियन ग्रैम ने बैक्टीरिया को उनके कैमिकल रिएक्शन और फिजिकल कंडीशन के आधार पर बांटा था। बैक्टीरिया की भीतरी झिल्ली के आधार पर और कैमिकल रिएक्शन और फिजिकल कंडीशन की बदौलत उन्होंने इनको अलग-अलग रूप में बांटा।