घनश्याम कक्का नहीं रहे, सुनकर पैरों तले की जमीन खिसक गई। यकीन ही नहीं हो रहा था। लेकिन यह सोचकर यकीन करना पड़ा कि जो आदमी इस दुनिया में आया है उसे एक न एक दिन तो जाना ही है। लेकिन यह कभी नहीं सोचा था कि कक्का इस तरह से अलविदा कह जाएंगे। मुझे वह दिन याद आया। जब वे अपने छोटे बेटे दिनेश के साथ देहरादून जाने से पहले हमारे घर आए थे। उस दिन वे बहुत खुश थे। पिता को जब कक्का ने यह बताया कि वे अपने बेटे के साथ देहरादून जा रहे हैं तो पिता ने कहा, ‘हमेशा के लिए जा रहा है या वापस भी लौटेगा?’ ‘मैं आपसे दूर नहीं रह सकता दद्दा। जब भी आपसे मिलने का मन करेगा। आ जाया करूंगा।’ ‘एक बात का ध्यान रखना भुला। आदमी कब बदल जाए कुछ पता नहीं।’ ‘अपनी-अपनी सोच है दद्दा। मैं दुनिया को छोड़ सकता हूं लेकिन अपने दद्दा को नहीं।’ ‘मुझे फोन पर अपनी सूचना देते रहना घनश्याम। तेरे चले जाने के बाद मैं तेरे इंतजार के अलावा कर भी क्या सकता हूं।’ घनश्याम कक्का खामोश हो गए। नजरें झुक गर्इं। उनके चेहरे को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे कि उन्हें अपने दद्दा से दूर करने के लिए कोई मजबूर कर रहा हो।कक्का जब तक गांव में थे।

वे हफ्ते में दो दिन पिता से मिलने हमारे घर जरूर आया करते। पिता का हुक्म सिर आंखों पर रखते हुए कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार रहते। लेकिन हफ्ते में जब कक्का के दो-तीन बार पिता के लिए फोन आते तो पिता सोचते कि वे अभी अकेले नहीं हैं। पिता के मुंह से हम अक्सर यही सुनते कि इतना प्यार और साथ देने वाला तो आज के जमाने में खास कोई अपना भी नहीं होता। अगर घनश्याम की पत्नी ने उसका साथ दिया होता तो उसकी आज ये दुर्दशा नहीं होती। पिता का कहना भी सही था। काकी के मरने के बाद कक्का ने अपना सारा जीवन अपने दोनों बेटों को पालने और पढ़ाई में लगा दिया। जिस समय काकी ने अपने प्राण त्यागे उस समय कक्का का बड़ा बेटा महेश तीन साल और छोटा बेटा दिनेश एक साल का था। उनके आगे-पीछे ऐसा कोई नहीं था जो उनकी देखभाल कर सके। कक्का हमारे घर आते तो अपने दोनों बच्चों को साथ में लाते और पिता के सामने रोने लगते। कई बार पिता ने कक्का से कहा, ‘इस तरह से कब तक रोता रहेगा घनश्याम। अपना जीवन देख और इन बच्चों का भविष्य देख। तू कहे तो मैं तेरे लिए कोई विधवा या फिर कोई तलाकशुदा औरत ला देता हूं। एक बार घर से निकल गया तो तभी घर लौटूंगा जब तेरे लिए ब्वारी लेकर आऊंगा।’ कक्का ‘न’ में अपना सिर हिलाते हुए कहते, ‘पता नहीं, वह मेरे बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करे। मेरे दोनों बच्चे सही सलामत रहेंगे तो जिंदगी जैसे भी कटेगी, कट ही जाएगी।’

पिता के समझाने पर भी कक्का ने दूसरी शादी नहीं की। वे अपने बच्चों के साथ अपनी जिंदगी व्यतीत करने लगे। धीरे-धीरे दिन गुजरते गए और बच्चे बड़े होते गए। और फिर एक समय ऐसा भी आया जब उन्होंने अपने दोनों लड़कों की शादियां कर दीं। बहुओं के आ जाने से कक्का के चेहरे पर लालिमा तैरने लगी थी। लेकिन कक्का के चेहरे पर यह लालिमा कुछ ही दिनों तक टिकी रही, क्योंकि दोनों लड़के अपनी पत्नियों को साथ लेकर चले गए। बड़ा लड़का महेश चंडीगढ़ और छोटा लड़का दिनेश देहरादून। कक्का एक बार फिर अकेले हो गए। परंतु अब वे पिता के सामने रोते नहीं थे। वे कैसे भी रहे लेकिन उनका हमारे घर आने का जो नियम था, उन्होंने उस नियम को कभी नहीं तोड़ा। और फिर अचानक ही कक्का के फोन आने बंद हुए तो फिर उनका फोन कभी नहीं लगा। पिता रात-दिन बड़बड़ाते, पता नहीं घनश्याम कैसा होगा? है भी या नहीं। लेकिन एक दिन कक्का को अचानक अपने घर आए देखकर हम चौंक पड़े। पिता के गले से लगकर कक्का बच्चों की तरह रोने लगे। रोते-रोते उन्हें हिचकियां आने लगीं। उनके आंसूं देखकर हमारे भी आंसूं निकल आए थे। ‘क्या बात है घनश्याम, तू इतना क्यों रो रहा है सब ठीक तो है न!’ ‘मेरे पर कलंक लग गया दद्दा। लांछन लग गया मेरे पे। मैं खतम हो गया दद्दा। तुझे देखे बिना मर गया होता तो आत्मा तुझसे मिलने के लिए हमेशा तड़पती रहती। मुझे मौत दे दे दद्दा।’ कक्का के शब्दों को सुनकर पिता सन्न रह गए। अपने दोनों हाथों से अपना मुंह छिपा लिया। बड़ी देर तक पिता के गले से लिपट कर रोते हुए कक्का का रोना जब रुका तो गांव से देहरादून जाने के बाद क्या हुआ वे विस्तार से सुनाने लगे।देहरादून आने के बाद कक्का बहुत खुश थे। लेकिन बहू के चेहरे पर जो हंसी थी उसकी जगह अब उदासी ने ले ली थी। आंखों के नीचे काले और स्याह धब्बे उभर आए थे। पहले की अपेक्षा वह बेहद कमजोर हो गई थी। एक दिन रसोईघर में बहू को रोते देखकर कक्का ने कहा, ‘जबसे मैं यहां आया हूं मैंने तुम्हारे चेहरे पर कभी हंसी नहीं देखी। तुम्हें देखकर ऐसा लगता है कि जैसे तुम कई महीनों से बीमार चल रही हो। क्या मेरा आना तुम्हें अच्छा नहीं लगा बहू।’ ‘ऐसी बात नहीं है जी।’ ‘फिर ऐसी कौन सी बात है जिसे लेकर तुम अंदर ही अंदर घुटती जा रही हो। मुझे बता बहू, मैं तेरा ससुर भी हूं और तेरा बाप भी। मुझे बताएगी तो मन का गम हल्का हो जाएगा।’‘ऐसा कुछ भी नहीं है जी। जबसे देहरादून आई हूं अपना मायका नहीं देखा।’बहू ने आसानी से बात टाल दी थी। मगर कक्का को उसकी बातों पर विश्वास नहीं हुआ। उन्हें इस बात का एहसास हो गया था कि इस घर में ऐसा कुछ तो जरूर है जो कि बहू उससे छिपा रही है। क्या छिपा रही है वे उसी बात को जानने की कोशिश में लग गए। लेकिन एक दिन उन्हें जब हकीकत का पता चला तो वे सिर से लेकर पैरों तक आने वाले समय में किसी भंयकर घटना को लेकर कांपने लगे।

उस दिन रात को कक्का की जब अचानक नींद खुली और अपनी आंखें मलते हुए वे बाहर छज्जे में आए तो अमर को सामने वाले घर में घुसते देखकर उनकी आंखें फटी की फटी ही रह गर्इं। दबे कदमों से वे नीचे उतरे तो बहू की सिसकियां सुनकर उनका कलेजा छलनी हो गया। वे चुपचाप उल्टे पैर अपने कमरे में वापस लौट आए। नींद अब उनकी आंखों से कोसों दूर थी। बेचैनी इतनी बढ़ गई थी कि वे लगातार अंदर बाहर चक्कर काटने लगे। उन्हें अब पूरी तरह से विश्वास हो चुका था कि आने वाले समय में बहू के जीवन में अंधेरे और कष्टों के अलावा कुछ नहीं है। वे सारी रात चहलकदमी करते रहे। सुबह अमर के जाने के बाद उन्होंने बहू से कहा, ‘सामने वाले घर में कौन रहता है बहू?’‘शांति, विधवा है और अपनी अंधी मां के साथ रहती है।’ कहते हुए वह रुआंसी हो गई। कक्का खामोश हो गए। उन्हें जिस बात का डर था वही हुआ। बहू के चेहरे पर छाई उदासी व आंखों में बहने वाले आंसुओं का कारण अब उनकी समझ में आ गया था। ‘मैं तुझसे एक बात पूछना चाहता हूं बहू। जो कल रात मैंने देखा क्या वह सच है?’ कक्का के शब्दों को सुनकर बहू को जैसे सोए हुए में किसी बिच्छू ने डंक मर दिया था। उसकी आंखें गीली हो आर्इं। उसके सिर को सहलाते हुए कक्का ने कहा, ‘मैं सच सुनना चाहता हूं बहू।’बहू ने सारी हकीकत कक्का को बताते हुए जब यह बताया कि दिनेश उसे रोज मारता है तो अचानक ही कक्का के मुंह से निकला, ‘मैंने तेरा बुरा कर दिया है बहू। भगवान मुझे कभी माफ नहीं करेगा। तेरी जिंदगी को नरक में झोंकने वाला अगर कोई है तो वह मैं हूं। मैं किसी और को दोष क्यों दूं।’ कहते हुए कक्का सामने वाले घर में जाने लगे तो बहू ने कहा, ‘कहां जा रहे हो जी।’ ‘मैं सारी हकीकत जानते हुए भी तुम्हारी तरह चुप नहीं रह सकता। समझ में नहीं आ रहा है कि तू सब कुछ जानते हुए भी खामोश क्यों रही? पुलिस में जाती, गली-मोेहल्ले की औरतों को इकट्ठा करती। लेकिन ऐसा न करके तू अपने आंसूं बहाती रही। मैं जा रहा हूं उसे समझाने। बहू कक्का को सामने वाले घर में जाते हुए देखती रही। काफी देर बाद जब कक्का वापस लौटे तो उनके चेहरे पर एक डरावना खौफनाक भय समाया हुआ था।

‘क्या हुआ जी?’ कक्का ने कोई जवाब नहीं दिया। वे चुपचाप ऊपर अपने कमरे में चले गए। अंधेरा होने के बाद दिनेश जब घर आ रहा था तो बसंती ने उसे रास्ते में रोकते हुए कहा, ‘तुम्हारे चले जाने के बाद तुम्हारा पिता उसकी इज्जत लूटने के लिए उसके घर आया था। लेकिन तुम्हारे बारे में सोचते हुए वह थाने में नहीं गई। अगर उसकी जगह कोई दूसरी औरत होती तो अब तक तुम्हारे पिता को पुलिस पकड़ कर ले गई होती।’ बसंती की बातें सुनकर दिनेश की आंखों में खून उतर आया। उसने आव देखा न ताव और घर आते ही अपने पिता पर हाथ छोडते हुए कहा, ‘जब शरीर में इतनी ही जलन थी तो शादी क्यों नहीं की। तुझे शादी करने के लिए किसी ने मना किया क्या? बसंती के घर में जाने की क्या जरूरत थी। अगर वह पुलिस को बुला लेती तो अब तक जेल में सड़ रहा होता। समझ में नहीं आ रहा है कि मैं अपने घर में बाप को पाल रहा हूं या किसी बलात्कारी को। अरे, अपनी उमर का खयाल तो किया होता। निकल यहां से…।’ कहते हुए दिनेश ने कक्का का हाथ पकड़कर उन्हें दरवाजे के बाहर धक्का दे दिया था। ये क्या कर रहे हो तुम। रात को ‘जी’ कहां जाएंगे। अपने करमों का फल दूसरों को क्यों दे रहे हो तुम?’ इससे आगे बहू कुछ कह पाती कि अमर के हाथ अब बहू पर चलने लगे थे। अपने घर के दरवाजे पर खड़ी होकर बसंती यह सारा तमाशा देख रही थी। उस रात कक्का कहां रहे कुछ पता नहीं। लेकिन कक्का को ढूंढ़ने के लिए बहू सुबकती हुई गलियों में भटकती रही। मगर कक्का उसे नहीं मिले। दूसरे दिन कक्का गांव के लिए निकल पड़े। वे जब गांव पहूंचे तो बेहद उदास व हताश दिखाई दे रहे थे। डबडबाई आंखों से वह पिता के गले लग कर आप बीती सुना रहे थे।उसके बाद कक्का डरे-डरे व सहमे-सहमे से रहने लगे। पहले की अपेक्षा अब उनका बोलना भी बहुत कम हो गया था। आकाश को निहारते हुए वे बड़बड़ाने लगते, ‘कलंक लग गया मेरे ऊपर। आ मौत आ…। ऐसे हालातों में भी उनका हफ्ते में दो बार हमारे घर आना हमेशा की तरह जारी रहा। इधर एक हफ्ते से जब कक्का हमारे घर नहीं आए तो पिता कक्का के गांव जाने की तैयारी करने लगे। लेकिन तभी कक्का के गांव से एक आदमी ने आकर पिता को जब यह बताया कि घनश्याम कक्का नहीं रहे तो पिता जमीन पर गिरते-गिरते बचे। अगर उस आदमी ने पिता को न पकड़ा होता तो पिता अवश्य ही पत्थरों में गिर गए होते। ‘यह सब कैसे हुआ?’ पिता ने रोते हुए पूछा। ‘सुबह जब लोगों ने दरवाजा खोलकर देखा तो घनश्याम कक्का चारपाई पर मरे पड़े थे। लाश अभी घर में ही है। आपको बुलाया है। घनश्याम कक्का जीते जी हमेशा लोगों से यही कहते रहे कि उनके मरने की सूचना उनके लड़कों को कभी भी मत देना। परंतु उनके मरने के बाद जब तक दद्दा का हाथ उनकी अर्थी पर नहीं लगेगा। उन्हें चौक में से मत उठाना।’ उस आदमी ने अपनी बीड़ी सुलगाते हुए कहा। ‘तूने मुझे धोखा दे दिया घनश्याम। तू मुझसे मिले बिना ही चला गया। तू तो कहता था कि मैं अपने दद्दा को मिले बिना नहीं जाऊंगा। वादा भूल गया रे तू। एक बार अपना वादा निभाने आ जा घनश्याम। आकर मेरे गले लग जा। तुझे कलंक से मुक्ति मिल गई घनश्याम। कैसा अभागा रहा तू। तुझे मुझे भेजना था जबकि मैं तुझे भेज रहा हूं।’ रोते हुए पिता ने अपनी लाठी उठाई और घनश्याम कक्का के घर की ओर चल पड़े।