नीरजा हेमेंद्र

बकरियों को सामने मैदान में चरने के लिए छोड़ कर कल्लन मंदिर वाले पीपल के नीचे बने चबूतरे पर इत्मीनान से बैठ गया। यहां से सामने मैदान में चर रहीं बकरियां स्पष्ट दिख रही थीं। वह रोज इधर ही बकरियां चराने आता है। बकरियों को सामने मैदान में चरने के लिए छोड़ कर मंदिर के इस चबूतरे पर बैठ जाता है। खेतों से लौटते, राह आते-जाते लोग यहां लगे हैंडपंप से पानी पीने आते हैं। उन सबसे और मंदिर में आने-जाने वालों से दुआ-सलाम, हालचाल हो जाती है। कल्लन का मन लगा रहता है।

इस छोटे-से गांव में कल्लन पीढ़ियों से रह रहा है। बचपन से ही वह इस गांव को देखता आ रहा है। गांव में कोई खास परिवर्तन नहीं हुआ है। परिवर्तन के नाम पर हुआ यह है कि गांव के जवान लड़के रोजी-रोटी की तलाश में अब शहर जाने लगे हंै। वे कहते हैं कि महंगाई बढ़ गई है। यहां की कमाई से परिवार का गुजारा नहीं हो पाता। उनकी बात ठीक भी है। गांव में खेती-बाड़ी, ढोर-जानवर पालने के अलावा रोटी-रोजगार का और कोई साधन नहीं है। अब इन कामों में परिश्रम अधिक और लाभ कम होता है। इन पैसों से आजकल घर चलाना मुश्किल होता जा रहा है। सब कुछ महंगा होता जा रहा है। कल्लन के दोनों बेटे भी परेशान रहते हैं। घर में पैसों की कमी हमेशा लगी रहती है।

कल्लन के पास अपनी थोड़ी-सी जमीन है, जिसमें सब्जियां बोई जाती हैं। उसके बेटे ले जाकर उन्हें बाजार में बेचते हैं। यही रोटी का जरिया है। उम्र हो गई है, इसलिए कल्लन से खेती नहीं हो पाती। बकरियां पालने और उन्हें बेचने तक का काम रह गया है कल्लन का। उसके दोनों लड़के अहमद और सगीर पास के शहर में जाकर रंगाई-पुताई का काम करने लगे हैं। मजदूरी के पैसों से उन्हें घर चलाने में आसानी हो जाती है। वर्ष के अधिकतर समय खेत खाली रहते हैं। कुछ महीनों के लिए मौसमी सब्जियां बोई जाती हैं। कल्लन, उसके दोनों बेटे और उनकी बीवियां मिल कर खेतों में काम करते हैं, तब हो पाता है।

दोपहर होने को है। कल्लन को प्यास लगी है। हैंडपंप के पास जाकर इधर-उधर देखने लगा। कोई दिखे तो हैंडपंप चला दे। इस समय मंदिर में भी कोई नहीं था। इतने में दूर से गांव का रमेसर आता दिखाई दिया। उसने थोड़ी ऊंची आवाज में पुकारा, ‘भइया! रमेसर भइया हो तनिक पानी चला दो।’
रमेसर ने आकर हैंडपंप चलाया। दुआ-सलाम हुआ और वह चला गया। कल्लन ने भी बकरियां को हांक लगा कर बुलाया और घर चलने को तत्पर हुआ। बकरियां हांकता हुआ घर आया। घर के बाहर दालान में बकरियों को छोड़ कर दरवाजे पर लगे हैंडपंप पर हाथ-मुंह धोया और चारपाई पर बैठ गया।
‘बहू! कुछ खाने को है क्या?’ उसने अहमद की बीवी सकीना को बाहर से ही आवाज लगाई।
‘हां अब्बू, खाना ला रहे हैं।’

सकीना थाली में रोटियां और सब्जी रख गई। दोपहर ढल रही थी। कल्लन को बेतरह भूख लगी थी। वे रोटियां खाने लगा। कल्लन के हैंडपंप पर गांव का सरजू पानी पीने आया। उसने सामने चारपाई पर कल्लन को रोटी खाते देखा तो बातें करने लगा।
‘का हौ दादा सब ठीक है।’ उसने कल्लन से पूछा।
‘हां बेटवा सब ठीक है। आवा रोटी खा ल।’ कल्लन ने सूरज से कहा।
‘फिर कबहूं दादा। तुम्हरे दिया त खात हैं।’ सूरज की बात सुन कल्लन हंस दिया।
‘हां बिटवा, बस ऊपर वाले क मेहरबानी रहै के चाही।’ सरजू पानी पीकर मुस्कराता हुआ चला गया।

यह एक छोटा-सा गांव है तुरहा पट्टी। आबादी अधिक नहीं है। यहां हिंदू-मुसलिम आबादी लगभग बराबर है। हिंदू आबादी में यादव, कुर्मी, निषाद, कुम्हार, बढ़ई आदि जातियां मिश्रित रूप से रहती हैं। मुसलिम आबादी में जुलाहा, दर्जी आदि रहते हंै। इस गांव में इनका अलग मुहल्ला-टोला नहीं बसा है। सब मिश्रित रूप से रहते हैं। गांव के दूसरी छोर पर मस्जिद है, जिसमें ईद-बकरीद जैसे त्योहारों में अपेक्षाकृत कुछ अधिक भीड़ रहती है। यहां के लगभग सभी परिवारों के पास कम-ज्यादा ही सही, पर अपनी जमीन है। परंपरागत व्यवसाय के अलावा सभी का मुख्य व्यवसाय कृषि है।

कल्लन की उम्र लगभग पैंसठ वर्ष है। सन की तरह सफेद दाढ़ी, खिचड़ी बाल, लंबा कुर्ता, अलीगढ़ी पैजामा और सिर पर मटमैला सफेद अंगोछा बांधे रहने वाले कल्लन की पीढ़ियां यद्यपि इसी गांव की रहने वाली थीं। कुछ परिवार रोजी-रोटी की तलाश में दूसरी जगह अवश्य चले गए, पर उनकी जड़ें जो इस गांव से जुड़ी हैं, उन्हें गाहे-ब-गाहे यहां खींच ही लाती हैं।
आज जुमे की नमाज पढ़ी जा रही है मस्जिद में, जैसा कि हर शुक्रवार को होता है। आज कल्लन ने मौलवी साहब के साथ एक नए शख्स को खड़े देखा। वह इस गांव का नहीं है। नमाज तो कल्लन हर जुमे को पढ़ता है। मस्जिद में इसी गांव के मौलवी साहब नमाज पढ़वा देते हैं। नमाज पढ़ कर सब अपने-अपने घर चले जाते हैं। आज मौलवी साहब के साथ खड़े शख्स ने सबको रोका और कुछ दीनी बातें बतार्इं। बातें तो बड़ी अच्छी कर रहा था वह शख्स। कल्लन के साथ सबने सुनी उसकी बातें। कल्लन को उसकी बातें कुछ-कुछ समझ में आर्इं, कुछ नहीं। इसलिए वह मुंह खोले बस सुनता रहा। अब लगभग हर जुमे को वह शख्स और उसके साथ कभी-कभी कोई और भी आता। वे दीनी बातें करते, एकजुट रहने की सलाह देते और चले जाते।

उनके जाने के बाद कल्लन देर तक सोचता कि यह एकजुटता क्या होती है? यहां गांव में सब मेलजोल से रहते हैं। कुछ अलग-थलग है नहीं? पूजा मंदिर में, नमाज मस्जिद में भले पढ़ी जाती है, पर आवश्यकता पड़ने पर एक-दूसरे से मिलने-जुलने हिंदू मस्जिद में तो मुसलमान मंदिर में जाता है। अब किस चीज में एकजुट होना है।… कल्लन सोचता रहता, पर समझ न पाता। रोज की तरह कल्लन आज भी मंदिर वाले चबूतरे पर बैठा था। सामने मैदान में बकरियां चर रही थीं। चैत का महीना था। धूप और गर्मी तेज होने लगी थी। पीपल की छांव तले ठंडी हवा चल रही थी। बड़ा सुकून मिल रहा था उसे। कभी कोई मंदिर में पूजा करने चला आता और घंटियां बजा देता तो कानों में रस की स्वर लहरियां घुलने लगती। सुकून से अधमुंदी आंखें और सफेद दाढ़ी में छिपे होंठ मुस्करा उठते।

‘चचा! उधर बैठ जाया करो। इहां लोग पूजा करने आवत हैं।’ किसना का स्वर पहचान गया कल्लन।
ई तो हमरे गांव का लड़का है। हमारे सामने का पैदा भवा। चचा चचा कहता है। कल्लन इसके और यह कल्लन के पूरे परिवार को जानता है।
‘अच्छा बेटवा! वहीं बैठ जाया करेंगे।’ कल्लन उठा और आसमान की ओर देखा। धूप जोर पकड़ती जा रही है। घर जाए का बेर हो गई। अब घर चलें। उसने हांक लगा कर बकरियों को बुलाया और चल पड़ा घर की ओर। गांव की गलियों में सबसे राम-राम, दुआ-सलाम करता हुआ कल्लन चला जा रहा था कि उसकी दृष्टि सहसा गांव के कच्चे-पक्के कुछ मकानों की छत पर गई। मकानों की छतों पर झंडे दिख रहे थे। झंडे भी दो रंगों के थे। वह मुंह बाए झंडों को देखता रहा। कोई त्योहार है क्या? वह सोचता रहा। उसे कुछ समझ में नहीं आया।
वह घर गया। बकरियों को दालान में हांक कर, रोटी खाकर चारपाई पर लेट गया। रह-रह कर उसे किसना की बात याद आ रही थी। पर उस बात का मतलब उसे समझ में नहीं आ रहा था। कल्लन के दरवाजे पर लगे हैंडपंप पर गांव के लोग पानी पीने आ रहे थे और चले जा रहे थे। कल्लन का मन कुछ उचाट-सा था। किसी से बातें नहीं की। मुंह फेर कर चारपाई पर लेट गया।

दूसरे दिन रोज की तरह बकरियां चराने कल्लन निकल पड़ा। सामने के मैदान में बकरियां चरने के लिए छोड़ कर उसके कदम स्वत: मंदिर की ओर बढ़ चले। सहसा उसे किसना की कही कल की बात याद आ गई। उसके कदम मंदिर की ओर से स्वत: वापस मुड़ गए। वह कहीं और बैठने का ठौर तलाशने लगा। सामने एक वृक्ष की घनी छांव में बैठ गया। उसका मन यहां लग नहीं रहा था। बार-बार हसरत भरी नजर मंदिर की ओर उठ जाती, जहां बैठ कर उसे सुकून मिलता था।

अब कल्लन गांव की गलियों से गुजरता तो गांव में उसे कुछ नया-नया सा दिखई देता। कुछ घरों की छतों पर उसे झंडे लहराते दिखाई देने लगे थे। दो रंगों के झंडे देखने में उसे अच्छे तो लगते, पर उसे समझ में न आता कि क्या ये झंडे घरों के ऊपर लगाना जरूरी है या लोगों ने यों ही लगा रखे हैं। अगर कल्लन को लगाना हुआ, तो वह दोनों में से किस रंग का झंडा लगाएगा?

धीरे-धीरे समय गुजरता गया और मंदिर में जाकर बैठने की आदत छूटती गई। मस्जिद में जब भी कल्लन जाता, मौलवी साहब के साथ बाहर का भी कोई न कोई रहता। वे लोग बातें तो दीन-धर्म की करते, पर उनकी बातें सुन कर कल्लन को ऐसा लगता जैसे मस्जिद में नमाज पढ़ने वाले लोग अलग हैं, और मंदिर में पूजा करने वाले अलग। सब अलग-अलग हैं, पर बातें एकजुटता की होतीं, कल्लन को समझ में न आता।

उस दिन गांव में पुराने बरगद तले लोग इकट्ठा हो रहे थे। कल्लन भी वहां रुक गया। थोड़ी देर में दो मोटरसाइकिलों पर चार लोग आए। वे किसी दूसरे गांव के लगते थे। वे गांव वालों को कुछ बता रहे थे। कल्लन भी बड़े ध्यान से उनकी बातें सुन रहा था। बातें सबके भले की थीं। एक बात जो मस्जिद में आए उन लोगों और यहां के लोगों की एक जैसी लगी वह थी एकजुटता की। ये भी सभी को एकजुट होकर रहने की बात कर रहे थे। उनमें से एक ने सबको झंडे बांटे। कल्लन का भी मन था छत पर रंगीन झंडा लगाने का। पर कल्लन को झंडा नहीं मिला।

बकरियां चराते-चराते कल्लन को एक दिन पता चला कि गांव में चुनाव है। यह कोई नई बात नहीं थी। चुनाव तो होते रहते हैं। कल्लन वोट भी डालता है। अब तक गांव में एक जगह सभा होती थी। अब एक सभा मस्जिद के बाहर होती है और दूसरी इस बरगद के नीचे। बकरियां चराने और खेती-बाड़ी करने के बाद जब भी समय मिलता, कल्लन दोनों सभाओं में जाता। उसे दोनों जगहों पर लोगों की बातें एक जैसी लगतीं। वह समझ नहीं पाता कि क्यों लोग दो जगहों पर खड़े होकर बातें करते हैं। चुनाव लड़ने के लिए गांव के जो भी लोग मैदान में खड़े थे, उन्हें कल्लन जानता है। उसे यह भी पता है कि उसमें कौन सही है और उसे ही वोट देना है। सारी उम्र निकल गई अब पैंसठ वर्ष के बाद समझ में आया कि गांव में एक नहीं, दो रंगों के लोग हैं। जब पूरी दाढ़ी सफेद हो गई तब घरों के ऊपर लगे झंडों के रंगों का अर्थ कुछ-कुछ समझ में आने लगा है।

अब उसे यह भी समझ में आया कि क्यों उसे वृक्ष के नीचे बैठ कर बकरियां चरानी हैं, मंदिर के चबूतरे पर बैठ कर क्यों नहीं? कभी-कभी कल्लन सोचता कि अगर सभी घरों पर एक ही रंग के झंडे लगा दिए जाएं तो उसमें क्या बुराई है… या सभी घरों पर दोनों रंगों के दो-दो झंडे लगा दिए जाएं तो क्या अच्छा नहीं लगेगा? जब दोनों रंगों के झंडे घरों की छतों पर लहराएंगे तो गांव कितना सुंदर लगेगा। लेकिन कल्लन ने अपने विचारों पर लगाम लगाते हुए सोचा कि वह अनपढ़ है, गंवार है, इसीलिए ऐसा सोचता है। चुनाव के दिन समीप आते-आते एकजुटता के स्वर और तेज होने लगे। कौन किससे एकजुट हो रहा था, यह कल्लन को समझ में नहीं आ रहा था। गांव में अब दो रंगों के झंडे बिकने लगे थे। जमाना तरक्की कर रहा था, ये बातें तो कल्लन सुनता आ रहा है, पर ऐसी तरक्की उसे अच्छी नहीं लग रही है या कल्लन पुराने जमाने का है इसलिए तरक्की के मायने उसे समझ नहीं आ रहा है। चुनाव का दिन आत-आते गांव में एकजुटता की ऐसी बयार बही कि कई जगह एकजुटता नजर आने लगी। टूट-टूट कर खंडित होती एकजुटता।

आज कल्लन अपने दरवाजे पर उदास बैठा है। बहुत दिनों से सरजू पानी पीने उसके दरवाजे नहीं आया। वह रोज उसका रास्ता ताकता है। आज सब लोग वोट डालेंगे। कल्लन जिसे वोट देना चाहता है वह इसी गांव का है। एकजुट लोग जिसे वोट डालने के लिए उससे कह रहे हैं वह भी इसी गांव का है। कल्लन उसे भी जानता है, पर उसे वाट देना नहीं चाहता। कल्लन को आजकल अच्छा नहीं लग रहा है। वह एकजुट नहीं हो पा रहा है। आखिर इतने वर्षों तक उसकी पुश्तें पूरे गांव की और पूरा गांव उसका अपना रहा है। नए जमाने की तरक्की उसे रास नहीं आ रही है। वह अस्वस्थ है। उसकी सांस फूल रही है। दम घुट रहा है। आज सब लोग वोट डालने जाएंगे, कल्लन नहीं जाएगा। क्योंकि गांव में हर आदमी अलग-अगल एकजुट हो गया है। दालान में बैठा कल्लन सरजू की राह देख रहा है। घरों की छतों पर अलग-अलग दो रंगों के झंडे नए जमाने की हवा में लहरा रहे हैं।