सुनील भट्ट
कविता: टीन की छत पर दो-दो बंदर
टीन की छत पर दो-दो बंदर
उछले कूदे नाचे बंदर।
जोर-जोर का शोर है होता
उससे खुश हो जाते बंदर।
मस्ती में सब मगन हैं बंदर
मानो ड्रम बजाते बंदर।
उनको मस्ती करते देखा
छत पर आ गए और भी बंदर।
धमा-चौकड़ी, शोर शराबा
कलाबाजियां खाते बंदर।
उफ! कितने शैतान ये बंदर
पहले दो थे, अब छह बंदर।
टीन की छत पर छह-छह बंदर
कूदे, उछले, नाचे बंदर।
दिमागी कसरत: नीचे कुछ पहेलियां और सवाल दिए गए हैं। उन्हें बूझो और बताओ। न समझ आए, तो जरा सिर घुमाओ और नीचे दिए उत्तर देख लो।
(1)- बिना तेल के जलता है
पैर बिना वो चलता है,
उजियारे लो बखेर कर,
अंधियारे को दूर करता है।
(2)- न मैं दिख सकती हूं, न मैं बिक सकती हूं और न ही मैं गिर सकती हूं, बताओ मैं कौन हूं?
(3)- रात में मैं रोती हूं और दिन में सुकून से सोती हूं, बताओ मैं कौन हूं?
(4)- नीचे दिया गया चित्र किसका है, पहचानिए और बताइए।
1- सूरज, 2- हवा, 3- मोमबत्ती, 4- जयशंकर प्रसाद
