… नहीं नहीं!

कोई भी निरापद
नीड़
नहीं है यहां
शीतल हरियालियों के
ये सभी एकांत
एक
एक
कर
सूंघ गया है कोई सांऽऽप…!
पत्तों पर एक अपशकुन थरथराता है…
भूले से कभी-कभी
कुहुक-कुहुक जाता
कोई अनजाना कंठ
समझ नहीं पाता
एकाएक…
अपनी अनुगूंज का
वन की जड़िमा में
पथरा जाना…
आकाशी राहों पर
अहेरी-आहटें।
ऊष्मित सहवासों पर
मंडराते शून्यों के डैने…!
हम कहां जाएं?
धरती-आकाश में
कहीं भी नहीं है
हमारे लिए ठौर
हम कहां जाएं?

सदियों से
हमारे गीत
ढोते-ढोते
ये हवाएं बूढ़ी हो चलीं!
शेष है सिर्फ एक
अनमना अज्यास…
जो हमें जीता नहीं
सिर्फ
सिर्फ सहता है।

फिर भी ये हवाएं
बहुत बहुत उदार हैं
जो हमें सहती हैं
और चाहे-अनचाहे
धरती के दिए हुए घावों को
सहला ही देती हैं
हवाएं फिर भी उदार हैं।
हमसे बिछुड़े
हमारे ही संवेदन
साथ नहीं देते
हवाएं फिर भी उदार हैं।
और… ये पंख
नहीं मानते
क्यों? किसके लिए?
चीखते विकल प्राण…!
हर बार।
पंख नहीं सुनते-
उड़ जाते हैं
आदतन।
हवाएं उन्हें झेल लेती हैं
आदतन।

एक दु:स्वप्न उन्हें
उछाल देता है रोज
नीली ऊंचाइयों में सूरज के स्वागत को
और फिर,
दिन भर की भटकनों के बाद
रहा-सहा अपनापन भी खो कर
सांझ के अंधेरे में
सहमे-सहमे… वे
अजनबी ढलानों पर
लुढ़कते फिसलते
वे
सोचना चाहते
अब… ?
लौट कर कहां जाएं?
कोई भी निरापद नीड़
नहीं है जहां…
वे
उस धरती पर
लौट कर
कहां जाएं?