क्या किसी समाज की पहचान वहां की स्थानीय भाषाओं में मौजूद बाल साहित्य से भी होती है? अगर हम इस सवाल का ईमानदारी से सामना करना चाहें तो पाएंगे कि हमारे समय में गुणवत्तापूर्ण बाल साहित्य की रचना न सिर्फ कम हो गई है, बल्कि इसकी वास्तविक महत्ता को स्वीकार करने में भी हम हिचकिचाने लगे हैं। भारतीय भाषाओं में हर बड़े साहित्यकार ने अपने लेखन के किसी न किसी दौर में बच्चों के लिए कविताएं किस्से और कहानियां तो खूब लिखे हैं, इनमें कुछ कालजयी रचनाएं भी हैं। लेकिन तकनीक की बढ़ती आक्रामकता और बदलती दुनिया के साथ-साथ बाल साहित्य के स्वरूप में जो विविधता और बदलाव आने चाहिए थे, वे नहीं आ सके हैं। नतीजतन, थोड़ा-बहुत लिखा जाने वाला बाल साहित्य भी बच्चों की कल्पनाशीलता और स्मृतियों में जगह नहीं बना सका है।
क्या इसका कारण सिर्फ इतना है कि आज अच्छा बाल साहित्य लिखा नहीं जा रहा या फिर ये कि बच्चों की पठन-पाठन क्षमता और आदतों में आ रहे तेज बदलावों का सामना करने में भारतीय भाषाएं सफल नहीं रह गई हैं? क्या बाल साहित्य टेलीविजन, इंटरनेट और आधुनिक माध्यमों के चलते हाशिये पर चला गया है? ये सभी ऐसे सवाल हैं जिन पर अक्सर अलग-अलग आयामों से बहस होती रहती है। फिलहाल इन सवालों से जुड़े एक विशेष पहलू को हाल में आई फिल्म ‘ दि जंगल बुक’ से समझने की कोशिश करते हैं। जंगल बुक की रचना सुप्रसिद्ध बाल रचनाकार रुडयार्ड किपलिंग ने साल 1967 में की थी। जंगल बुक की कहानी भी जंगल के एक समाज के माध्यम में भारतीय परिवेश और उससे जुड़े हुए पहलुओं को उकेरती है। किपलिंग की इस रचना के 49 साल बाद भी ‘ दि जंगल बुक’ को सिर्फ इसलिए नहीं सराहा गया क्योंकि इसमें थ्री डी और बाकी उन्नत तकनीकों का समावेश किया गया।
निश्चित तौर पर इन उन्नत तकनीकों ने फिल्म की प्रस्तुति को ज्यादा प्रभावी बना दिया है, मोगली के तौर पर नील सेठी के जानदार अभिनय को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन फिल्म की लोकप्रियता की सबसे बड़ी वजह रही भारतीय जंगलों और इसकी संस्कृति में रचे-बसे वही पुराने पात्र जिन्होंने कभी किपलिंग की इस कहानी को दूरदर्शन पर लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचाया था। नब्बे के दशक में पली-बढ़ी युवा पीढ़ी के बचपन को कल्पनाओं के रंग में रंगने में ‘दि जंगल बुक’ की अप्रितम भूमिका रही। कहने की जरूरत नहीं कि आज जब 49 साल बाद यह कहानी इस पीढ़ी ने बड़े परदे पर देखी तो यह उनकी यादों को सहज ही ताजा कर गई। दरअसल ‘दि जंगल बुक’ की इस हालिया सफलता ने बताया है कि भारतीय भाषाओं में बाल साहित्य रचते हुए हम भारत की विविधतापूर्ण स्थानीय संस्कृति की अनदेखी नहीं कर सकते। अगर ‘दि जंगल बुक’ में पात्रों के नाम और पटकथा को थोड़ा बहुत बदलकर पेश किया जाता तो क्या इसे वास्तव में वैसी ही सफलता मिलती, जैसी अब मिली है? आज भूमंडलीकरण की दुनिया में बच्चों के लिए उन्नत तकनीकों और कृत्रिम पात्रों वाली ढेरों कहानियां और उन पर आधारित फिल्में मौजूद हैं, लेकिन ‘दि जंगल बुक’ की सफलता के सामने सब थोड़ी फीकी नजर आती हैं।
बाल साहित्य में फैटेंसी के प्रयोग पर भी बहस होती रहती है। लेकिन फैटेसी हमेशा यथार्थ से दूर या कटी हुई नहीं होती। कई बाल कहानीकारों ने ऐसे प्रयोग किए हैं, जिनमें फैंटेसी यथार्थ को और ज्यादा गहरा और असरदार बना देती है। बाल साहित्यकार प्रकाश मनु ने अपनी कई कहानियों में परियों का इस्तेमाल जादुई शक्ति के तौर पर नहीं किया। उन्होंने अपने एक साक्षात्कार में बताया कि उनकी कहानियों में परियां या ऐसे पात्र बच्चों के मन में हिम्मत जगाकर जाते हैं। ठीक इसी तरह बाल कथाकार हरिकृष्ण देवसरे की कहानी ‘जूतों के अस्पताल’ आधुनिक विषय के साथ बड़ा रोचक प्रयोग है।
बाल कहानियों, फिल्मों, कविताओं में पात्रों की पृष्ठभूमि को लेकर भी चिंतन होने की आवश्यकता है। आम तौर पर यह माना जाता है कि ऐसी रचनाएं लिखना या उनका फिल्मांकन करना मुश्किल है जो सभी वर्ग के बच्चों की कल्पनाशीलता को छुए। बाल साहित्य में आदिवासी और ग्रामीण संस्कृति के पात्रों का गायब होते जाना इसका उदाहरण है, जबकि इस बात के बहुत से प्रमाण मौजूद हैं कि इन पात्रों को आधार बनाकर लिखी गई रचनाएं भी साहित्य और फिल्मांकन के स्तर पर काफी प्रसिद्ध हो जाती हैं। इसका कारण यह है कि ग्रामीण, आदिवासी और मुख्य धारा से कटे समाजों में कहानी कहने और सुनने की मौखिक परंपरा काफी विकसित होती है। इतना अवश्य है कि इन्हें स्थानीय भाषाओं में प्रकाशित करना हमेशा मुश्किल होता है। इसके लिए ऐसे समाजों के स्थानीय पात्रों पर आधारित कथाएं, कहानियां, उपन्यास ज्यादा से ज्यादा प्रकाशित होने आवश्यक हैं। वहीं इन रचनाओं का अच्छा अनुवाद होना जरूरी है, इन कटे हुए समाजों की संस्कृतियों के बारे में मुख्य धारा समाज को भी जानकारी मिल सके। गोंड कहानीकार चंद्रकला जगत की कहानी ‘जादुई मच्छी’ मशहूर हुई है। ‘सातवां सूरज’ ओड़िया आदिवासी बच्चों के समूह द्वारा कही गई और उन्हीं के द्वारा चित्रित सरल कहानी है। यह एक आदिवासी लोककथा है, जो उस समुदाय के पर्यावरण प्रेम को सामने रखते हुए पाठकों का भी इस तरफ ध्यान खींचती है।
यह एक सुखद संकेत हैं कि भारतीय भाषाओं में ऐसी कहानियों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है जिनमें स्त्रियां या लड़कियां मुख्य किरदार हैं। गोपीचंद्र श्रीनागर की ‘पानी वाली लड़की’ ऐसी ही एक कहानी है। सुरेखा पणंदीकर और क्षमा शर्मा का नाम भी विशेष तौर पर ऐसी कहानियों के लिए लिया जा सकता है।
बाल साहित्य के प्रति आ रही उदासीनता की बड़ी वजह स्वयं बच्चों से जुड़ी सामाजिक संवेदना में आ रही कमी है। हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने अपने ‘श्रेष्ठ बाल साहित्य की चिंता’ निबंध में लिखी है कि जो लेखक संवेदना के क्षेत्र में बच्चों से जुड़ा नहीं है और जिसके पास कोई युग चेतना नहीं है, वह अच्छे बाल साहित्य की रचना नहीं कर सकता। बच्चों के प्रति सामाजिक संवेदना से ही वह भाषा आती है जिससे उनसे संवाद संभव हो पाता है। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की इस बात से हमें यह समझ मिलती है कि बाल साहित्य के लिए बच्चों के मनोविज्ञान और उन्हें प्रशिक्षित करने वाले अनुभवों को समझना आवश्यक है। हिंदी में प्रेमचंद्र बाल मनोविज्ञान के बड़े पारखी कहे जाते हैं। उनकी कहानियों में बच्चों के संवाद जिस सहजता और भदेसपन के साथ आते हैं, वह आज के बाल साहित्यकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत हो सकते हैं। अपनी कहानी ‘ईदगाह’ में उन्होंने मोहसिन को उकेरने में जिन संवादों, शब्दों और घटनाओं का सहारा लिया, वह बच्चों के मनोविज्ञान के बारे में उनकी गहरी समझ को ही दर्शाता है।
वास्तव में साहित्य जगत और हमारे समाज में बाल साहित्य की महत्ता को ठीक से पहचाना भी नहीं गया है। यही वजह है कि कई बार इसे सस्ता साहित्य या तरीका मानकर जैसे-तैसे लिख भर दिया जाता है। हालांकि, कई भारतीय भाषाओं में बाल साहित्य रचनाएं लेखकों के लिए प्रमाण पत्र की तरह होती हैं।
उदाहरण के तौर पर बांग्ला भाषा में जिस किसी लेखक ने बाल साहित्य में योगदान नहीं दिया होता, उन्हें सही मायनों में लेखक नहीं माना जाता। असल में बाल साहित्य तो किसी भी भाषा की समृद्धि का मानक होता है। बाल मनोविज्ञानियों ने बताया है कि बच्चों से उपदेश की भाषा में संवाद स्थापित नहीं किया जा सकता। उसके लिए रचनात्मकता और कल्पनाशीलता प्राथमिक आवश्यकता है। देखा जाए तो बाल साहित्य के लगातार नीरस होते जाने का कारण भी उसमें आ रही कल्पनाशीलता और रचनात्मकता की कमी है।
बाल साहित्य और उसके विकास में बाधक बन रहे ये सभी कारक एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि बीते सालों में अच्छा बाल साहित्य बिलकुल भी रचा नहीं गया, लेकिन अलग-अलग कारणों से यह अपनी मौजूदगी मजबूत तरीके से दर्ज नहीं करवा पाया। वास्तव में, बाल साहित्य किसी भी भाषा के लिए उस पहली सीढ़ी की तरह होता है, जिसके बगैर वह भाषा आगे के पायदान नहीं चढ़ सकती। इस पहले पायदान पर किसी भी भाषा को चलना ही पड़ता है।

