निर्देशक- जयंत गिलटर
कलाकार-जूही चावला, शबाना आजमी, दिव्या दत्त, जैकी श्रॉफ, जरीना वहाब, ऋचा चड्ढा, आर्य बब्बर, ऋषि कपूर, समीर सोनी
शिक्षा व्यवसाय है या सामाजिक जिम्मेदारी? स्कूलों की क्या भूमिका होनी चाहिए? सामाजिक विषमता को मिटाना या मैनेजमेंट के लिए पैसा कमाना? क्या हमारी शिक्षा के आदर्श बदल गए हैं?
अगर आपको लगता है कि इन प्रश्नों पर ज्ञानवर्धन के लिए आपको फिल्म देखने जाना चाहिए तो आप `चाक एन डस्टर’ जरुर देंखें। फिल्म मनोरंजन पर कम और सामाजिक जागरूकता और शिक्षा की सामाजिक जिम्मेदारी पर अधिक बल देती है। इसकी कहानी के केंद्र में है कांताबाई हाईस्कूल जहां (विद्या) शबाना आजमी और ज्योति (जूही चावला) नाम की दो समर्पित शिक्षाकाएं हैं। आदर्शों से भरपूर। स्कूल की प्राचार्य हैं ही इंदुजी (जरीना वहाब)। सब कुछ ठीक ठाक चल रहा है लेकिन अचानक बदलाव आता मैनेजमेंट में।
नया मैनेजमेंट तय करता है कि स्कूल अब पुराने ढर्रे पर नहीं चलेगा। स्कूल की साजसज्जा से लेकर पढाने लिखाने का तरीका बदलेगा। मैनेजमैंट की कोशिश है कि स्कूल का लुक बदले जिससे समाज का धनी तबका उससे जुड़े। दूसरे शब्दों में स्कूल को मुनाफे का व्यवसाय बनाने का सिलसिला शुरू होता है औऱ यही से शुरू होती है नए मैनेजमेंट के साथ विद्या और ज्योति की टकराहट।
नए मैनेजमेंट के तहत स्कूल की कमांन मिलती है कामिनी गुप्ता को जो न सिर्फ बहुत सख्त है बल्कि बेहद अडियल है। स्कूल में एक शिक्षिका को सिर्फ इसलिए निकाल दिया जाता है कि वह सिर्फ चार मिनट देर से पहुंचती है। पर यह सब तो भूमिका है। वास्तविक मुठभेड़ तब शुरू होती है जब विद्या और ज्योति नए मैनेजमेंट के खिलाफ खड़ी हो जाती है। फिर कहानी में टीवी चैनल का प्रवेश होता है और मामना सार्वजनिक बन जाता है। दो मूल्यों की लड़ाई शुरू होती है और आखिर में किसकी जीत होती है इसका आप अनुमान भी लगा सकते हैं।
इसमें संदेह नहीं कि विषय के हिसाब से ये एक मौजू फिल्म है और आजकल जिस तरह पब्लिक स्कूलों का घोर व्यावसायीकरण हो रहा है और उसकी तरफ ये संकेत करती है। फिल्म में शबाना आजमी और जूही चावला का भूमिकाएं भी लाजबाब है। शबाना तो पारंपरिक भारतीय शिक्षिका की तरह लगी हैं। न सिर्फ पहनावे और चालढाल में बल्कि अपने विचारों में भी। जूही भी बिंदास लगी हैं। पर शबाना और जूही के साथ साथ जो अभिनेत्री सबसे कमाल की लगी है वो हैं दिव्या दत्त। उनके चरित्र में खलनायकी के तत्व जरूर हैं पर शायद इस फिल्म की सबसे लंबे समय तक याद रखी जानेवाली किरदार कामनी ही है।
हठीली और दूसरों को चुनौती देनेवाली। धूर्त और चालाक भी। कुछेक दृश्यों में तो वे शबाना पर भी भारी पड़ती है। ऋचा चढ्ढा का किरदार छोटा है। वे कैरियर के जिस पड़ाव पर हैं क्या उनको ये भूमिका करनी चाहिए थी? शबाना और जूही तो अब दूसरी पारी खेल रही हैं और दोनों इस तरह की ही भूमिकाएं में अब आएंगी। पर ऋचा चड्ढा को तो सोचना चाहिए। आर्य बब्बर मैनेजमेंट के आधुनिक प्रतिनिधि है जो यह मानता है कि आज का सबसे अच्छा बिजनेस एडुकेशन है। ऋषि कपूर का कैमियो रोल है। एक क्विजमास्टर का। पर वे जमें हैं। फिल्म के गीत जावेद अख्तर ने लिखे हैं जो जल्द ही भुला दिए जाएंगे।
