वौशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को वरूथिनी एकादशी कहते हैं। इस महीने यह एकादशी 30 अप्रैल, मंगलवार यानि आज है। कहते हैं वरूथिनी एकादशी का विधिपूर्वक व्रत रखने से मानसिक कष्ट दूर होती हैं। साथ ही इस एकादशी के व्रत के प्रभाव से व्यक्ति को सुख, समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में वरूथिनी एकादशी व्रत के लाभ के बारे में बताया गया है कि जो मनुष्य इस एकादशी का व्रत रखता है उसे जो ब्राह्मणों को दान करने से, तपस्या करने से और कन्यादान करने से मिलता है, उससे कहीं अधिक फल वरूथिनी एकादशी करने से प्राप्त होता है। आगे जानते हैं वरूथिनी एकादशी की व्रत-कथा और महत्व।
कथा: वरूथिनी एकादशी के बारे में शास्त्रों-पुराणों में कथा वर्णित है। इस कथा के अनुसार नर्मदा नदी के किनारे मांधाता नाम का एक दानशील और तपस्वी राजा अपना राज्य खुशीपूर्वक चलाता था। राजा बहुत धार्मिक था और अपनी प्रजा को हमेशा खुश रखता था। एक बार राजा ने जंगल में तपस्या शुरू दी। इसी बीच जंगली भालू राजा को अकेला देख उसके पैर खाने लगा। भालू यहीं नहीं रुका। वह राजा को घसीटता हुआ जंगल लेकर जाने लगा। राजा यह देख घबरा गए, लेकिन उन्होंने भालू को मारा नहीं और न ही उसके साथ हिंसा की।
राजा ने भगवान विष्णु की प्रार्थना शुरू कर दी। जिसके बाद भगवान विष्णु प्रकट हुए और उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से भालू का वध कर दिया। राजा की जान तो बच गई लेकिन उनका पैर भालू खा चुका था। राजा अपने अधूरे पैर को देख बहुत निराश हुआ और भगवान विष्णु से हाथ जोड़ पूछने लगा कि हे प्रभू ऐसा मेरे साथ क्यों हुआ? भगवान विष्णु ने बताया कि तुम्हारे पूर्व जन्म के कर्मों के कारण ही आज तुम्हारा यह हाल हुआ है। इतना सुनकर राजा ने भगवान विष्णु से इसका कोई उपाय पूछा।
भगवान श्रीहरि ने कहा कि दुखी मत हो भक्त। तुम मेरी वाराह अवतार की पूजा करो और बरुथिनी एकादशी का व्रत रखो और उसका विधिवत पालन करो। इनके प्रभाव से तुम फिर से पूर्ण अंगों वाले हो जाओगे। राजा ने नारायण के कहे अनुसार इस व्रत को अपार श्रद्धा के साथ किया। कहते हैं कि कुछ दिनों के बाद ही राजा को अपने पैर वापस मिल गया। इसलिए शास्त्रों में कहा गया है कि वरूथिनी एकादशी के व्रत से मनुष्य के समस्त सांसरिक कष्ट दूर हो जाते हैं।

