उत्तर प्रदेश के वाराणसी जनपद के काशी नगर में स्थित 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक श्री विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग है। हिंदू धर्म में काशी विश्वनाश मंदिर का एक विशिष्ट स्थान माना जाता है। इसी के साथ मान्यता है कि एक बार इस मंदिर के दर्शन करने और पवित्र नदी गंगा में स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। माना जाता है कि काशी तीनों लोकों में सबसे न्यारी मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माना जाता है कि काशी भगवान शिव के त्रिशूल पर विराजती है। काशी नगरी की उत्पत्ति और भगवान शिव की प्रिय बनने की कथा स्कन्द पुराण के काशी खंड में वर्णित की गई है।
मान्यता है कि पृथ्वी के निर्माण के समय सूर्य के प्रकाश की पहली किरण काशी पर ही पड़ी थी। इसी कारण के आधार पर इसे ज्ञान और अध्यात्म का केंद्र माना जाता है। निर्वासन के समय भगवान शिव कई साल बिताने के बाद इस स्थान पर आए थे और कुछ समय तक काशी में निवास किया था। ब्रह्माजी ने उनका स्वागत दस घोड़ों के रथ को दशाश्वमेघ घाट पर भेजकर किया था। काशी में भगवान शिव विश्वश्वर नामक ज्योतिर्लिंग में निवास करते हैं। कहा जाता है कि भगवान शिव को इच्छा हुई कि वो एक से दो हो जाएं। इसी कारण से उन्होनें खुद को दो रुपों में बांट लिया और एक हिस्सा शिव कहलाया और दूसरा हिस्सा बना शक्ति। उस समय आकाशवाणी हुई और उन्हें तपस्या करने की सलाह दी गई। तपस्या के लिए भगवान शिव ने अपने हाथों से पांच कोस लंबे भूभाग पर काशी का निर्माण किया और यहां विश्वश्वर के रुप में विराजित हुए।
काशी के वर्तमान मंदिर का निर्माण महारानी अहिल्या बाई होल्कर द्वारा सन् 1780 में करवाया गया था। इसके बाद महाराजा रंजीत सिंह ने 1853 में एक हजार किलोग्राम शुद्ध सोने द्वारा मढ़ावाया गया था। काशी विश्वनाथ भी भारत के अमीर मंदिरों में से एक माना जाता है। हर साल इस मंदिर में करोड़ों को चढ़ावा आता है।
