स्वस्तिक एक ऐसा चिह्न है जिसे खुशहाली और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। वैसे तो हिन्दू धर्म में किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत स्वस्तिक का प्रतीक बनाकर ही की जाती है। मान्यताओं के अनुसार इस चिह्न को भगवान श्रीगणेश, सूर्य और ब्रह्मांड का भी प्रतीक माना गया है। लेकिन हैरान करने वाली बात तो ये है कि इस चिह्न को भारत के अलावा कई अन्य देशों में भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इन सब के बीच क्या आप जानते हैं कि पवित्र स्वस्तिक चिह्न को भारत के अलावा किन-किन देशों में इस्तेमाल किया जाता है? साथ ही हिटलर ने इस चिह्न को क्यों अपनाया था? यदि नहीं! तो आगे हम इसे जानते हैं।
दरअसल संस्कृत में स्वस्तिक शब्द का अर्थ सौभाग्य होता है। हजारों वर्षों से इस चिह्न का प्रयोग हिन्दू, जैन और बौद्ध धर्म को मानने वाले लोग करते आ रहे हैं। हालांकि अगल-अलग देशों में होने की वजह से इसके नामों में भी भिन्नता देखने को मिलती है। चीन में इसे वान, जापान में मांझी, इंगलैंड में फिल फोट, जर्मनी में हेकेन ग्रीस, और ग्रीस में टेट्राकुलस के नाम से जाना जाता है। वहीं कुछ देशों में इस चिह्न को उल्टा भी उपयोग में लिया जाता है और उसे स्वस्तिक कहा जाता है। तजाकिस्तान की आबादी मुस्लिम है। इस देश में स्वस्तिक को राष्ट्र चिह्न में से एक माना जाता है। साथ ही अमेरिका के प्रसिद्ध ब्रांड कोका-कोला ने भी स्वस्तिक का इस्तेमाल अपने प्रोडक्टस पर किया था।
तुर्की के मशहूर शहर टोय में एक बार खुदाई के दौरान ऐसे बर्तन मिले थे जिन पर स्वस्तिक के निशान थे। कहा जाता है कि हिटलर ने भी अपने झंडे पर स्वस्तिक के निशान का इस्तेमाल किया था। प्रेम और सौभाग्य के प्रतीक रहे स्वस्तिक का उपयोग हिटलर ने गलत कामों के लिए किया। इसलिए आज जर्मनी में इस चिह्न पर पाबंदी लगी है। इसके अलावा अमेरिकी लेखक स्टीफन हेलार्ड ने स्वस्तिक और उसके महत्व को बताते हुए एक किताब लिखी जिसका नाम The Swastika (A symbol beyond Redemption) है। इतिहासकारों की यदि मानें तो जब यूरोपीय लोग भारत आए थे तब वो इस निशान के सकारात्मक प्रभाव से काफी प्रभावित हुए। इस तरह वे लोग इस चिह्न को भारत के बाहर ले गए और इस्तेमाल में लाने लगे।
