सूर्य को इस चराचर जगत का प्रत्यक्ष देवता माना गया है। जो मनुष्य को प्रत्यक्ष और दिव्य स्वरूप में दिखाई देते हैं। यही कारण है कि शास्त्रों में भी सूर्य उपासना का काफी महत्व बताया गया है। वेदों के अनुसार सूर्य इस जगत की आत्मा हैं। इसलिए प्राचीन काल से ही भारत में सूर्य की उपासना का प्रचलन चला आ रहा है। जिस प्रकार अन्य सभी देवी-देवताओं की उपासना के लिए शास्त्रों में खास दिन बताया गया है, उसी प्रकार सूर्य की पूजा-अर्चना के लिए रविवार का दिन श्रेष्ठ और शुभ है। वैसे तो भगवान सूर्य की पूजा हर शुभ मानी गई है लेकिन रविवार का दिन इनकी उपासना के लिए बेहद शुभ माना गया है। आगे हम जानते हैं सूर्यदेव के जन्म का रोचक प्रसंग।
मर्कण्डेय पुराण के अनुसार पहले यह सम्पूर्ण जगत अंधकारमय था। उस समय ब्रह्मा जी प्रकट हुए। उनके मुंह से पहला शब्द ‘ॐ’ निकला, जो सूर्य का तेजरूपी सूक्ष्म रूप था। उसके बाद ब्रह्मा जी के चारों मुंह से चार वेदों की उत्पत्ति हुई जो इस ॐ के साथ मिलकर एकाकार हो गए। कहते हैं कि यही वैदिक तेज ही आदित्य है, जो विश्व का अविनाशी कारण है। साथ ही ये वेद स्वरूप सूर्य ही इस सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार के कारण हैं। ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर सूर्य ने अपने दिव्य तेज को समेटकर सुलभ तेज को ही धरण किया। सृष्टि रचना के समय ब्रह्मा जी के पुत्र मरीचि हुए जिनके पुत्र ऋषि कश्यप का विवाह अदिति से हुआ।
अदिति ने घोर तप द्वारा ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया जिन्होंने उनकी इच्छा पूर्ति के लिए सुषुम्ना नाम की किरण से उनके गर्भ में प्रवेश किया। कहते हैं कि गर्भावस्था में अदिति चन्द्र नारायण जैसे कठिन व्रतों का पालन करती थी। ऋषिराज नें गुस्से में आकर अदिति से कहा- ‘तुम इस तरह उपवास रखकर गर्भस्थ शिशु को क्यों मारना चाहती हो?’ यह सुनकर अदिति ने गर्भ के बालक को पेट से बाहर कर दिया। जो अपने दिव्य तेज से प्रज्ज्वलित हो रहा था। इसके बाद भगवान सूर्य शिशु रूप में उस गर्भ में चले गए। मान्यता है कि अदिति को मारिच्यम अंडम काहा जाने के कारण यह बालक मार्तंड नाम से प्रसिद्ध हुआ। वहीं ब्रह्म पुराण में अदिति के गर्भ से जन्मे सूर्य के अंश को विवश्वान कहा गया है।
