Skanda Sashti 2019: स्कंद षष्ठी का व्रत शिव-पार्वती के पुत्र भगवान कार्तिकेय को समर्पित है। साल 2019 में यह 12 मार्च, मंगलवार से शुरू हो रहा है। शास्त्रों के अनुसार स्कंद षष्ठी का उत्सव छह दिनों तक मनाया जाता है। उत्तर भारत में शिव-पार्वती के पुत्र को कार्तिकेय कहते हैं, वहीं दक्षिण भारत में उन्हें मुरुगन के नाम से जाना जाता है। तमिलनाडू, केरल आदि दक्षिण प्रांतीय इलाकों में कार्तिकेय की विशेष रूप से पूजा की जाती है। इसे स्कंद षष्ठी पूजा भी कहते हैं।
स्कंद षष्ठी मुरुगन के जन्म और असुरों के नाश की खुशी के तौर पर मनाया जाता है। स्कंद षष्ठी को उनकी पूजा से वे भक्तों के कष्ट हरते हैं और उन्हें सद्बुद्धि देते हैं। छह दिवसीय इस उत्सव में सभी भक्त बड़ी संख्या में इक्कट्ठा होते हैं। कई जगह जुलूस भी निकाले जाते हैं। इसके अतिरिक्त दक्षिण भारत के प्रसिद्ध मंदिर जैसे – उडूपी और पलानी हिल्स में बने भगवान सुब्रमण्यम के मंदिर, थिरुपरमकुनरम मंदिर आदि में विशेष पूजा की व्यवस्था की जाती है। इन प्रसिद्ध जगहों में विशाल मेले का भी आयोजन किया जाता है। जहां देश-भर के श्रद्धालु हिस्सा लेते हैंभगवान मुरुगन को दर्शाने वाला प्रतीकात्मक अंक 6 होता है।
स्कंद षष्ठी के तौर पर मनाया जाने वाला भगवान मुरुगन का जश्न भी 6 दिनों तक चलता है। कई मंदिरों में भगवान मुरुगन अर्थात कार्तिकेय की 6 सिरों वाली मूर्ति हैं। भगवान मुरुगन 6 शक्तियों के स्वामी हैं। उनके सबसे शक्तिशाली मंत्रों का क्रम भी 6 है, जो कि इस प्रकार है “सा, रा, वा, ना, बा, वा”। इसके अतिरिक्त भगवान मुरुगन 6 इंद्रियों के भी स्वामी हैं। स्कंद षष्ठी व्रत के पहले दिन भगवान मुरुगन की पूजा करने से आपको व्यापार में लाभ होगा। साथ यदि आप विवाहित या अविवाहित हैं, व्यापार करते हैं तो ये दिन आपके लिए सफलता एवं खुशियां लेकर आएगा। इसके अतिरिक्त स्कंद षष्ठी के 2,3 और 4 दिन विधिपूर्वक पूजन से स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं खत्म होती है। यदि आप लंबे समय से बीमार हो तो इससे भी छुटकारा मिलता है।
साथ ही इस दिन आपके साथ अचानक कुछ ऐसा घट सकता है जिसका आपको सुखद परिणाम मिलेगा। यदि आप स्कंद षष्ठी के 5 वें एवं 6वें दिन पूरी निष्ठा से भगवान मुरुगन की पूजा करते हैं तो इससे आपको भगवान का आशीर्वाद मिलेगा। इसके अलावा आपकी वित्तीय स्थिति में भी सुधार आएगा। साथ ही आपके करियर और व्यवसाय में उन्नति होगी। स्कंद षष्ठी का व्रत 24 घंटों के लिए होता है। ये षष्ठी के प्रारंभ से सूर्योदय से पहले शुरू हो जाता है। इस दिन भोजन नहीं किया जाता। हालांकि आजकल कई लोग फल खाकर इस व्रत को पूर्ण करते हैं। इस व्रत में भक्त भगवान मुरुगन की कथाएं सुनते व पढ़ते हैं।
वे स्कंद पुराण एवं स्कंद षष्ठी कावासम का भी पाठ करते हैं। इस दिन भक्त सुबह स्नान करके भगवान मुरुगन के दर्शन को मंदिर भी जाते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार जब देवता गण सुरपदमा नामक असुर के आतंक से परेशान थे तब उन्होंने मदद के लिए भगवान शिव से कहा। तब भगवान शिव और पार्वती ने अपने पुत्र कार्तिकेय अर्थात मुरुगन को भेजा। मुरुगन ने असुर सुरपदमा को 6 दिनों के युद्ध में हरा दिया। इसलिए इन 6 दिनों को सुरा सम्हारण के तौर पर भी मंदिरों में मनाते हैं। कई मंदिरों में इस घटना को नाटक के रूप में भी पेश किया जाता है।
