Sita Navami 2019 Vrat Katha: सीता नवमी वैशाख शुक्लपक्ष की नवमी को मनाई जाती है। इसे जानकी नवमी भी कहते हैं। शास्त्रीय मान्यता है कि इसी दिन माता सीता प्रकट हुईं थी। यही कारण है कि हिन्दू धर्म में आस्था रखने वाले इस दिन को व्रत-उपवास रखते हैं। इस बार सीता नवमी (जानकी नवमी) 13 मई 2019 यानि आज मनाई जा रही है। कहते हैं कि जिस प्रकार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी पर रामनवमी का महत्व है, ठीक उसी प्रकार वैशाख शुक्ल नवमी पर जानकी नवमी का महत्व है। परंतु क्या आप जानते हैं कि सीता नवमी क्यों मनाई जाती है? और जानकी नवमी (सीता नवमी) की व्रत कथा क्या है? यदि नहीं! तो आगे जानिए।

प्राचीन समय की बात है किसी गांव में वेददत्त नामक एक ब्राह्मण अपनी पत्नी सुहाना के साथ रहते थे। उनकी पत्नी व्यभिचारी थी। एक दिन ब्राह्मण भिक्षा के लिए गए हुए थे। मौका पाकर ब्राह्मण की पत्नी कुसंगत में पड़कर व्यभिचार कर्म में लिप्त हो गई। उसके व्यभिचार कर्म के कारण उस गांव में आग लग गई और उस व्यभिचरिनी ब्राह्मणी का अन्त हो गया। अपने पाप कर्म के कारण उस ब्राह्मणी का जन्म चांडाल के घर में हुआ । वह अंधी होने के साथ-साथ कुष्ठ रोग से ग्रसित थी। इस तरह से वह अपने पूर्व जन्म के कर्मों का फल भुगत रही थी। एक दिन वह भूख-प्यास से बेहाल भटकती-भटकती वेदवती गाँव पहुँची। उस दिन वैशाख मास की पुण्यदायिनी शुक्ला नवमी थी। वह क्षुधा से व्याकुल लोगों से गुहार लगाने लगी कि कृपा करके मुझे कुछ अन्न दे दो।

कहते-कहते वह चांडालिनी श्री स्वर्ण भवन के हजार पुष्प मंडित स्तम्भों के पास पहुँच गई और गुहार लगाई‌ – “मुझे कुछ खाने को दे दो।” तभी एक संत ने कहा- “हे देवी! आज सीता नवमी का पावन पर्व है, इस दिन अन्न देने वाला पाप का भाग होता है। इसलिए तुम कल सुबह आना व्रत के पारणा के समय और ठाकुर जी के प्रसाद को ग्रहण करना।” उसके बहुत विनती करने पर किस ने उस चांडालिन को तुलसीदल और जल दिया। वहीं खा कर वह मर गई। लेकिन अनजाने में ही उससे सीता नवमी का व्रत हो गया था। उस व्रत के प्रभाव से उसके सभी पाप नष्ट हो गए। अगले जन्म में वह कामरूप के महारज की पत्नी कामकाला के नाम से प्रसिद्ध हुई। उन्होंने कई मंदिरों का निर्माण करवाया और सारा जीवन धर्म के कार्यों में लगी रही। इसी प्रकार से जो मनुष्य सीता नवमी पर विधि-विधान से व्रत तथा पूजन करते हैं, वे सभी प्रकार के सुख तथा सौभाग्य को प्राप्त करते हैं।