आज यानि 08 अप्रैल 2019 (सोमवार) को चैत्र नवरात्रि का तीसरा दिन है। इस दिन देवी दुर्गा की तीसरी स्वरूप माता चंद्रघंटा की पूजा होती है। नवरात्रि में व्रत रखने वाले सभी लोग इस दिन देवी के तीसरे स्वरूप की भक्ति भाव से पूजा-अर्चना करते हैं। देवी भागवत पुराण में देवी चंद्रघंटा के स्वरूप का वर्णन किया गया है। जिसके अनुसार मां चंद्रघंटा स्वयं शक्ति की शिवदूती रूप है।

देवी चंद्रघंटा के माथे पर एक अर्धचंद्र के आकर में तिलक सुशोभित है जो की मां के स्वरुप को और दिव्य और भव्य बनता है। इसके अलावा पौराणिक कथाओं के अनुसार चंद्रघंटा देवी ने राक्षसों का वध घंटे की टंकार से ही किया था। देवी का ये स्वरुप सचमुच बहुत ही अद्धभुत है और उनके दस हाथो में विभूषित खड्ग, बाण, अस्त्र-शस्‍त्र उनके रूप को और शोभित करते हैं।

आगे हम जानते हैं कि चैत्र नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा देवी की पूजा किस विधि से करें। साथ ही देवी दुर्गा के इस स्वरूप की पूजा के लिए आरती और मंत्र कौन-कौन से हैं।

मंत्र-1: पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकेर्युता। प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता। इस मंत्र के बारे में पंडितों का कहना है कि नवरात्रि के तीसरे दिन देवी चंद्रघंटा की पूजा कर देवी के मंत्र का जाप करना चाह‍िए। इसके बाद अन्य पूजन शुरू करना चाहिए। फिर अंत में आरती आदि करनी चाहिए।

मंत्र-2: ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः

नवरात्र में तीसरे दिन की पूजा की विधि
मां चंद्रघंटा की पूजा विधिपूर्वक करने से अत्यंत लाभ प्राप्त होता है। इनकी पूजा के लिए सबसे पहले माता का साज-श्रृंगार करना चाहिए। फिर पुष्‍प, दुर्वा, अक्षत, गुलाब, लौंग कपूर आदि से मां की व‍िध‍िवत पूजा-अर्चना करनी चाह‍िए। पूजन के बाद चंद्रघंटा देवी के मंत्र का जाप करना चाहिए। फिर विधिपूर्वक आरती करनी चाहिए। साथ ही नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा देवी को हलवे या फ‍िर क‍िसी म‍िठाई से भोग लगाना चाहि‍ए।

देवी चंद्रघंटा की आरती
जय माँ चन्द्रघंटा सुख धाम। पूर्ण कीजो मेरे काम॥
चन्द्र समाज तू शीतल दाती। चन्द्र तेज किरणों में समाती॥
क्रोध को शांत बनाने वाली। मीठे बोल सिखाने वाली॥
मन की मालक मन भाती हो। चंद्रघंटा तुम वर दाती हो॥

सुन्दर भाव को लाने वाली। हर संकट में बचाने वाली॥
हर बुधवार को तुझे ध्याये। श्रद्दा सहित तो विनय सुनाए॥
मूर्ति चन्द्र आकार बनाए। शीश झुका कहे मन की बाता॥
पूर्ण आस करो जगत दाता। कांचीपुर स्थान तुम्हारा॥
कर्नाटिका में मान तुम्हारा। नाम तेरा रटू महारानी॥
भक्त की रक्षा करो भवानी।

स्तोत्र पाठ
आपदुध्दारिणी त्वंहि आद्या शक्तिः शुभपराम्।
अणिमादि सिध्दिदात्री चंद्रघटा प्रणमाभ्यम्॥
चन्द्रमुखी इष्ट दात्री इष्टं मन्त्र स्वरूपणीम्।
धनदात्री, आनन्ददात्री चन्द्रघंटे प्रणमाभ्यहम्॥
नानारूपधारिणी इच्छानयी ऐश्वर्यदायनीम्।
सौभाग्यारोग्यदायिनी चंद्रघंटप्रणमाभ्यहम्॥