शास्त्री कोसलेन्द्रदास

राम राज्य यानी पारदर्शी राज्य। ऐसा राज्य जिसमें कोई दरिद्र, दुखी और दीन नहीं हो। रामायण में लिखा है कि राम राज्य में कोई बीमार नहीं होता था। पिता के सामने पुत्र की मृत्यु नहीं होती थी। स्त्रियां पतिव्रता और सदा सुहागन होती थी। लोग हृष्ट-पुष्ट और धार्मिक होते थे। स्वधर्म पर चलने वाली प्रजा केवल राजा से नहीं बल्कि परस्पर भी प्रेम करती थी। श्रीराम के राज में महामारी और अकाल नहीं होते थे। दैहिक, दैविक और भौतिक तापों से प्रजा मुक्त थी।

रामायण में है तप
रामायण का प्रथम शब्द है तप। सारी रामकथा तप को प्रतिष्ठित करती है, जिसमें मानवीय स्तर पर एक से एक करुणाजनक दृश्य और चेहरे उपस्थित होते हैं, जिनके भीतर सूर्य तप रहा है और उन्हें मधुमय बना रहा है। इन दृश्यों और पात्रों से गुंथा ग्रंथ रामायण है जो श्रीराम की अमर गाथा है।

शुचिता के सर्वश्रेष्ठ प्रतिमान
सर्वव्यापक, निरंजन, निर्गुण और अजन्मे ब्रह्म ही प्रेम और भक्ति के वश होकर माता कौसल्या की गोद में उतरते हैं। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को मध्याह्न में जन्मे श्रीराम जगत के प्रकाशक हैं। रामचरितमानस कहती है कि नवजात बालक राम को देखने सूर्य एक मास तक अपनी जगह से हिले ही नहीं, पूरा महीना एक दिन में बदल गया।

उनका चरित अगाध गुणों का समुद्र है, जिसमें सारे ऋषि-योगी व भक्त-संत हंसरूप में विचरण करते हुए मोती चुनते हैं। राम मर्यादा, धर्म, उपकार, सत्य, दृढ प्रतिज्ञा तथा चरित्र शुचिता के अनुपम प्रतिमान हैं। वे इतिहास के सबसे अधिक प्रकाशित तेजोमय महानक्षत्र, जिनके प्रकाश से सारे चर और अचर चमक रहे हैं।

मन, वचन और कर्म में एक
भागवत महापुराण के अनुसार श्रीराम ने अपना अवतार मनुष्य जाति को चरित्र-शिक्षण देने में लगाया। उनका पूरा अवतार काल माता-पिता, बंधु-बांधव, परिवार, राजा-प्रजा और नारी के प्रति सम्मान को प्रकट करता है। श्रीराम जो विचारते हैं, वह कहते हैं। जो कहते हैं, वह करते हैं। वे मन, वचन और कर्म में एकरूप हैं। कथन की अपेक्षा कर दिखाना, अधिक विश्वसनीय होता है।

कथन मिथ्या हो सकता है पर जिया हुआ जीवन एक तथ्य है, जिसे नकारा नहीं जा सकता। इसीलिए राम हरेक मानव को हर दशा में प्रभावित करते हैं। राम का यह प्रभाव किसी के कथन पर नहीं बल्कि उनके जीवन के सत्य पर आधारित है। श्रीराम के चरित की यह विशेषता है कि वे एक ही बात बोलते हैं। एक ही बाण से शत्रुओं का नाश करते हैं और एकपत्नी व्रत धारण करते हैं। कैकेयी जब उन्हें कहती है कि राम, तुम निश्चित ही वन चले जाओगे ना? तो वे माता कैकेयी से कहते हैं, राम दो बात नहीं बोलता माता। मैंने वन में जाने का जो वचन दिया, उसे मैं अवश्य ही पूरा करूंगा।

भारत की संस्कृति को पहचानने वाला चेहरा श्रीराम का है। उनकी जीवनगाथा रामायण हमारी अमर परंपरा का आधार है। श्रीराम का जीवन चरित्र होने से रामायण आज तक भारतीय समाज की चेतना का महाकाव्य है। किसी भी पंथ, परंपरा, भाषा, राष्ट्र तथा संस्कृति में रामायण जैसा ग्रंथ किसी के पास है ही नहीं।

भारत के हरेक नर-नारी को अपने चरित्र के नायक-नायिका के रूप में देखने के लिए राम और सीता प्राप्त हैं। महर्षि वाल्मीकि की उद्घोषणा है कि श्रीराम धर्म के साक्षात विग्रह हैं।

तृष्णा में राम की जरूरत
मौजूदा समाज की स्थिति, तृष्णाएं और इच्छाएं बदल रही है। वैज्ञानिक आविष्कारों के जंगल में फंसे लोगों को उद्दाम भोग की संस्कृति मार रही है। फिर भी पुरातन वैदिक संस्कृति जीवित है तो भला इसका रहस्य क्या है? दुनिया की किसी जाति ने नारी के सतीत्व पर इतना जोर नहीं दिया, जितना हमारे पूर्वजों ने दिया। दुनिया की किसी धार्मिक परंपरा ने दाम्पत्य-जीवन को लेकर महाकाव्य नहीं रचा जबकि हमारा स्वाभाविक इतिहास रामायण पवित्र दाम्पत्य जीवन का महाकाव्य है।

अब जब पाश्चात्य संस्कृति हम पर बुरी तरह से हावी है, पाश्चात्यों का समृद्ध समाज ही हमारा आदर्श बन चुका है। ऐसी हालत में सोचें तो लगता है कि हमारी नाव डूबने से तभी बच सकेगी जब राम हमारे आदर्श हों। रामायण का आदर्श हमारा आदर्श हो। राम सिर्फ सीता के लिए और सीता सिर्फ राम के लिए है। उनके अवतार में काम का प्रलोभन और अवदमन दोनों ही नहीं है।

सगुण और निर्गुण के मिलन बिंदु
श्रीराम न केवल सगुण भक्तिधारा के भक्तों के ही जीवनाधार हैं बल्कि निर्गुण धारा के संत भी अपना निर्गुण ब्रह्म राम में ही खोजते हैं। एक ओर जगद्गुरु रामानुजाचार्य, रामानंदाचार्य और गोस्वामी तुलसीदास सगुण धारा के संत, वहीं महात्मा कबीर के निर्गुणी मन से लेकर रैदास, धन्ना, नानक, दादू व रामचरण जैसे असंख्य भक्त राम को पाकर ही हमारे आराध्य व श्रद्धा के केंद्र आज तक बने हुए हैं।

राम चरित का जादू है कि घर में संतान जन्में तो राम जन्म के गीत और विवाह हो तो वर-वधू में राम-सिया की जोडी के दर्शन तथा अंत में भी उन्हीं राम का नाम। उनका जीवन और नाम, दोनों भक्तों के जीवन का आधार है। जीवन के अंत में आसरा भी उसी राम नाम का, जिसको बीती शताब्दी के विख्यात संस्कृत विद्वान पं. नित्यानंद दाधीच ने लिखा- स्त्री सखा अपत्य हैं, भाव ये असत्य हैं/एक नाम सत्य है, राम नाम सत्य है।