Lohri 2026 Katha Dulla Bhatti Ki Kahani: क्या आप जानते हैं कि हर साल लोहड़ी पर गाया जाने वाला गीत ‘सुंदर मुंदरिए’ कोई साधारण गाना नहीं बल्कि एक जांबाज लुटेरे की वीरता की दास्तां है? हर साल मकर संक्रांति के एक दिन पहले लोहड़ी का पर्व मनाया जाता है। लोहड़ी का पर्व एक-दूसरे को बधाई देना, भागड़ा करना तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे न्याय, वीरता और दया की एक गौरवशाली कहानी छिपी है। पंजाब में एक कहावत मशहूर है कि दुल्ला भट्टी के बिना लोहड़ी की आग अधूरी है। आइए जानते हैं दुल्ला भट्टी और’सुंदर-मुंदरिए की कहानी…
कौन था दुल्ला भट्टी? (Who was Dulla Bhatti)
दुल्ला भट्टी का असली नाम ‘अब्दुल्ला भट्टी’ था, जो मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में पंजाब में रहता था। उसे ‘पंजाब का रॉबिनहुड’ कहा जाता था। दुल्ला भट्टी अमीरों और अत्याचारी जमींदारों को लूटकर उस धन को गरीबों में बांट देता था। लेकिन उसकी प्रसिद्धि का असली कारण था बेसहारा बेटियों की रक्षा करना।
दुल्ला भट्टी और सुंदरी और मुंदरी की कहानी (Dulla Bhatti Sundar Mundariye Ki Kahani)
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार पंजाब में मुगल बादशाह अकबर के शासनकाल में एक लुटेरा रहता था जिसका नाम दुल्ला भट्टी था। वह एक ऐसा लुटेरा था, जो अमीरों के घर से लूट करके गरीबों के बीच बांट देता है। इसके साथ ही उसने एक अभियान चलाया था कि ऐसी गरीब लड़कियों का विवाह कराना था जिनके ऊपर शाही जमींदारों और शासकों की बुरी नजर होती है। कई बार इन लड़कियों को अगवा करके गुलाब बनाकर दासियों वाला व्यवहार किया था। ऐसी लड़कियों के लिए दुल्ला भट्टी लड़का ढूंढता था और उनका विवाह करवाया था।
एक बार की बात करें कि दुल्ला भट्टी को दो ऐसी बहनों का पता चला, जो काफी रूपवान थी। इन बहनों का नाम सुंदरी और मुंदरी थी। इन दोनों गरीब बहनों को जमींदार से अगवा करके अपने साथ ले आया। इसके बाद किसी तरह से दुल्ला भट्टी ने उनके लिए वर ढूंढे और उन दोनों बहनों को छुड़ाया और एक जंगल में लकड़ी इकट्ठा करके आग लगाई और दोनों बहनों का विवाह कराकर कन्यादान किया। इस घटना के बाद पूरे पंजाब में दुल्ला भट्टी को नायक की उपाधि दी गई। इसी के कारण दुल्ला भट्टी के साथ सुंदर मुंदरिए नामक लोकगीत गाया जाता है।
दुल्ला भट्टी ने शगुन में दिया था शेर भर शक्कर
शादी के समय दुल्ला भट्टी के पास देने के लिए कोई कीमती उपहार नहीं था। उसने शगुन के तौर पर सुंदरी और मुंदरी की झोली में ‘शेर भर शक्कर’ (करीब सवा किलो चीनी) डाल दी। इसी घटना की याद में आज भी लोहड़ी की आग जलाई जाती है और उसमें तिल, गुड़ और शक्कर अर्पित की जाती है।
‘सुंदर-मुंदरिए’ लोकगीत
विवाह के समय दुल्ला भट्टी ने जो गीत गाया था, वही आज लोहड़ी का सबसे प्रसिद्ध लोकगीत बन गया है:
“सुंदर मुंदरिए- हो! तेरा कौन विचारा- हो! दुल्ला भट्टी वाला- हो! दुल्ले धी व्याही- हो! सेर शक्कर पाई- हो!
डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी ज्योतिषीय गणनाओं और सामान्य मान्यताओं पर आधारित है। व्यक्तिगत कुंडली के अनुसार परिणामों में भिन्नता हो सकती है। किसी भी बड़े निर्णय से पहले विशेषज्ञ ज्योतिषी से परामर्श अवश्य लें।
