इस्लाम में धर्म के प्रति निष्ठा और गहरी भावना देखने को मिलती है। साथ ही यह धर्म अपने नियम और कानूनों के लिए भी जाना जाता है। यहां इबादत करने के भी नियम हैं जिससे हर एक मुसलमान के लिए मानना जरूरी है। यह उसके लिए अपने धर्म के पालन करना है। वहीं हज यात्रा को भी इस्लाम के विभिन्न नियमों में से एक है। परंतु क्या आप जानते हैं कि इस्लाम में हज यात्रा को इतना अधिक महत्व क्यों दिया गया है? साथ ही जब मुसलमान हज यात्रा करते हैं तो किस शैतान पर पत्थर मारते हैं और क्यों? यदि नहीं तो आगे इसे जानिए।
इस्लाम धर्म यह मानता है कि अल्लाह की मेहर पाने के लिए हज यात्रा बेहद जरूरी है। जिस प्रकार हर मुसलमान नमाज और रोजे अदा करके अल्लाह के करीब हो जाता है, इसी प्रकार वह हज यात्रा को भी अहमियत देता है। इसे पूरा करके वह मुसलमान होने का फर्ज अदा करता है और अपने जन्म को सफल मानता है। हज यात्रा से प्रत्येक इस्लामिक अनुयायी की गहरी धार्मिक भावना जुड़ी होती है। पूरे दुनिया से हज अदा करने के लिए मुसलमान मक्का में एकत्र होते हैं। मक्का का मतलब केंद्र। कहते हैं कि मक्का शहर दुनिया के मध्य में स्थित है। यही कारण है कि चारों दिशाओं के मुसलमान ‘हाजिर हूं, मैं हाजिर हूं’ कहते हुए उसके दरबार में पहुंचते हैं।
हज यात्रा के दौरान किए जाने वाले कुछ ऐसे रश्म और रिवाज हैं जो हैरान करने वाली हैं। इन्हीं में से एक है शैतान को पत्थर मारना। मुस्लिमों के सबसे बड़े तीर्थ स्थल सऊदी अरब के पास मक्का के करीब स्थित रमीज मारात में शैतान को पत्थर मारने की रश्म आज भी चली आ रही है। ऐसा माना जात है कि इस रश्म को अदा किए बिना प्रत्येक यात्री की ये हज यात्रा अधूरी है। कहते हैं कि यहां शैतान को पत्थर मारने की रश्म तीन दिनों की होती है।
बता दें कि ईद-उल-जुहा के त्योहार के अवसर पर इस रश्म की शुरुआत होती है। लेकिन यह रश्म क्यों बनाई गई यह भी जानना हर मुसलमान के लिए आवश्यक है। इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार हज पर गए सख्स तीसरे दिन अपने बेस कैंप से निकलकर रमीज माराज जाते हैं। जहां बाद-बड़े खंभे हैं। दरअसल यही खंभे शैतान हैं जिन पर पत्थर मारकर उनको लानत भेजी जाती है और इस रश्म के साथ ही हज पूरा हो जाता है।

