दूर्वा एक प्रकार का घास होता है जो भगवान गणेश को बहुत प्रिय है। कहते हैं कि गणेश जी को दूर्वा चढ़ाना बहुत ही शुभ और लाभकारी है। सभी देवों में गणेश जी एकमात्र ऐसे देवता हैं जिन्हें दूर्वा अर्पित की जाती है। धर्म शास्त्रों में कई जगह ऐसा उल्लेख आया है कि गणेश जी को दूर्वा चढ़ाने से जीवन में आ रही विघ्न-बाधाओं का नाश होता है। वहीं धार्मिक मान्यता यह भी है कि भगवान गणेश की पूजा में तुलसी का प्रयोग नहीं किया जाता है। परंतु क्या आप जानते हैं कि भगवान गणेश को दूर्वा क्यों प्रिय है? और इनकी पूजा में तुलसी का प्रयोग की मनाही क्यों है? आगे जानते हैं इसे।

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार अनलासुर नामक राक्षस का अत्याचार बहुत अधिक बढ़ गया था। जिसके कारण ऋषिगण, देवता, इंसान और पशु-पक्षी ये सभी परेशान थे। इस असुर के आतंक को रोकने के लिए सभी शिव जी के पास जाकर विनती की कि वे उन्हें इस दैत्य से बचाएं। भगवान शिव उनकी विनती सुनकर कहते कहते हैं कि इसका उपाय तो केवल गणेश के पास है। फिर सभी गणेश जी से अनलासुर को संहार करने की बात कही, जिसे गणेश जी ने स्वीकार किया। फिर भगवान गणेश का अनलासुर के साथ युद्ध हुआ।

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इस युद्ध में गणेश जी अनलासुर को निगल जाते हैं। इस दैत्य को निगलने के बाद भगवान गणेश के पेट में भयानक जलन होने लगी। जिसे देखकर सभी देवतागण चिंतित हो गए। तब कश्यप ऋषि ने दूर्वा की 21 गांठ बनाकर भगवान गणेश को खाने के लिए देते हैं। दूर्वा को खाते ही उनके पेट की जलन खत्म हो जाती है। प्रसन्न होकर गणेश की कहते हैं कि जो भक्त उन्हें इस प्रकार दूर्वा अर्पित करेगा उसके ऊपर उनकी कृपा बनी रहेगी। कहते हैं कि तभी से भगवान गणेश को दूर्वा अर्पित किया जाने लगा।

वहीं गणेश जी को तुलसी न चढ़ाने के पीछे कारण ये है एक बार तुलसी ने गणेश को उनसे विवाह करने को कहा। जिसे भगवान गणेश ने यह कहकर ठुकरा दिया कि वे ब्रह्मचारी हैं। परंतु तुलसी अपने जिद पर अड़ी रही। तुलसी के जिद्द से नाखुश होकर उन्होंने तुलसी को श्राप दिया कि उसका विवाह एक राक्षस से होगा, लेकिन अगले जन्म में वो पेड़ बनी रहेंगी। कहते हैं कि तुलसी को श्राप देने की वजह से भगवान गणेश को तुलसी नहीं चढ़ाई जाती है।