रावण अपने पूर्व जन्म में भगवान विष्णु के द्वारपाल हुआ करते थे। परंतु एक श्राप के कारण उन्हें तीन जन्मों तक राक्षस कुल में जन्म लेना पड़ा। रावण को महापंडित, महाज्ञानी, महान ज्योतिष के जानकार और एक महान शिव भक्त के तौर पर जाना जाता है। कहते हैं कि लंकापति रावण के पास तंत्र-मंत्र, संगीत, ज्योतिष और खगोल विद्या का भी ज्ञान था। पौराणिक कथा के अनुसार रावण अपने पूर्व जन्म में स्वर्गलोक से संबंध रखता था। परंतु ऐसा क्या हुआ जो उन्हें न सिर्फ आगामी जन्मों में बल्कि आने वाले तीन जन्मों तक असुर के रूप में ही जन्म लेना पड़ा? चलिए आगे इसे ही जानते हैं।
पौराणिक कथा के अनुसार एक बार ब्रह्मा जी के मानस पुत्र सनक, सानंदन, सनातन और सनतकुमार भगवान विष्णु के दर्शन के लिए वैकुंठ धाम पहुंचे। परंतु भगवान विष्णु के द्वारपाल जय और विजय ने उन्हें प्रवेश देने से इनकार कर दिया। इस पर ऋषि गण अप्रसन्न हो गए और क्रोध में आकर जय-विजय को शाप दे दिया कि तुम राक्षस हो हो जाओ। जय-विजय ने प्रार्थना की और अपराध के लिए क्षमा मांगी। भगवान विष्णु ने भी क्षम करने को कहा तब ऋषियों ने अपने श्राप की तीव्रता कम की और कहा कि तीन जन्मों तक तुम्हें राक्षस कुल में जन्म लेना पड़ेगा।
इसके अलावा एक और शर्त थी कि भगवान विष्णु या उनके किसी अवतारी स्वरूप के हाथों मारना भी अनिवार्य होगा। यह श्राप राक्षस राज रावण के जन्म की आदि गाथा है। भगवान विष्णु के द्वारपाल पहले जन्म में हिरण्यकश्यप राक्षस के रूप में जन्में हिरण्याक्ष राक्षस बहुत शक्तिशाली था और उसने पृथ्वी को उठाकर पाताल लोक में पहुंचा दिया था। पृथ्वी को बचाने के लिए भगवान विष्णु ने वाराह अवतार लेकर उस राक्षस का वध कर पृथ्वी को मुक्त कराया।
भगवान विष्णु द्वारा अपने भाई हिरण्याक्ष का वध करने की वजह से हिरण्यकश्यप विष्णु विरोधी था। फिर भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार धारण कर हिरण्यकश्यप का वध किया था। त्रेययुग में दोनों भाई रावण और कुंभकरण के रूप में पैदा हुए और विष्णु अवतार श्रीराम के हाथों मारे गए। तीसरे जन्म में द्वापर युग में जब भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में जन्म लिया तब दोनों शिशुपाल और आनंदवक्त्र नाम के अनाचारी के रूप में पैदा हुए। कहते हैं कि इन दोनों का वध भी भगवान श्रीकृष्ण के हाथों ही हुआ था।
