Kalki Dwadashi Puja Vidhi And Shubh Muhurt: शास्त्रों में कल्कि द्वादशी का विशेष महत्व बताया गया है। शास्त्रों के अनुसार धर्म की पुनर्स्थापना और पापियों का नाश करने के लिए भगवान विष्णु कलियुग में कल्कि के अवतार में जन्म लेंगे। वहीं यह श्री हरि विष्णु का 10वां और आखिरी अवतार होगा। वहीं पंचांग के अनुसार हर साल भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को कल्कि द्वादशी मनाई जाती है। जो इस साल 7 सितंबर को पड़ रही है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा- अर्चना करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। साथ ही शत्रुओं पर विजय हासिल होती है। आइए जानते हैं श्री हरि की पूजा का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि…
जानिए पूजा का शुभ मुहूर्त
वैदिक पंचांग के अनुसार 7 सितंबर को पूरे दिन द्वादशी तिथि रहेगी। वहीं इस तिथि के स्वामी भगवान विष्णु है। इसलिए कल्कि भगवान की पूजा सुबह 7 बजे से 9 बजे तक कर सकते हैं।
जानिए पूजा विधि
कल्कि द्वादशी के दिन सुबह जल्दी स्नान करके साफ सुथरे कपड़े पहन लें। इसके बाद पूजा घर में चौकी पर पीला वस्त्र विछाएं और भगवान कल्कि की प्रतिमा या मूर्ति स्थापित करें। वहीं अगर कल्कि भगवान की प्रतिमा नहीं हो तो भगवान विष्णु की प्रतिमा रख लें। इसके बाद घूप- अगरबत्ती जलाएं। साथ ही इसके बाद कल्कि भगवान को पीला चंदन लगाएं और पीले फूल- फल अर्पित करें। भगवान के समक्ष तेल या घी का दीपक प्रज्वलित करें। भगवान कल्कि की पूजा करने के बाद उनकी आरती उतारें। साथ ही विष्णु चालीसा और ऊं नमो भगवते वासुदेवाय नम: मंत्र का जाप करें।
जानिए धार्मिक महत्व
शास्त्रों के अनुसार कल्कि भगवान विष्णु के दसवें और आखिरी अवतार होगा। श्री हरि का कल्कि अवतार बहुत आक्रामक होगा, जिसमें विष्णु जी सफेद घोड़े पर सवार होकर हाथ में तलवार लिए पापियों का नाश करने उतरेंगे। इस दिन भगवान विष्णु की विधिवत पूजा करने से जीवन की हर मुश्किल, हर संकट दूर हो सकता है। पुराणों के अनुसार कल्कि अवतार उत्तरप्रदेश के मुरादाबाद जिले के शंभल नामक स्थान पर होगा। भविष्य में होने वाले भगवान के इस अवतार के वर्तमान में बहुत से मंदिर हैं। जहां न केवल कल्कि भगवान की पूजा होती है बल्कि उनके घोड़े की प्रतिमा को भी आदरपूर्वक प्रणाम किया जाता है।
