Pradosh Vrat Vidhi: प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित होता है। यह व्रत हर माह की त्रयोदशी तिथि को पड़ता है। ज्येष्ठ शुक्ल की त्रयोदशी 14 जून को यानि आज है। इसे प्रदोष इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसे प्रदोष काल में किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस समय शिव और शक्ति दोनों प्रसन्न मुद्रा में होते हैं। साथ ही जब हम इस समय पर उनकी पूजा करते हैं तो अन्य सभी सभी देवी-देवताओं की पूजा का फल हमें प्राप्त होता है। कहते हैं कि प्रदोष व्रत की पूजा में भक्तों को कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना होता है। आगे जानते हैं कि इसे।
शास्त्रों प्रदोष व्रत के लिए शाम का समय अत्यंत शुभ बताया गया है। इसके लिए पूजन का समय शाम के साढ़े चार बजे से लेकर छह या सात बजे तक रहता है। यानि ढाई घंटे का जो समय होता है ये संधि काल होता है। साथ ही ऐसा कहा जाता है कि भगवान शिव माता पार्वती के साथ प्रसन्न मुद्रा में बैठे होते हैं। सभी भगवान उनकी पूजा कर रहे होते हैं और सभी प्रकार का आशीष वहां बरस रहा होता है। इसलिए इस समय जब हम शिव की पूजा करते हैं तो सभी देवी-देवताओं का आशीर्वाद भक्तों को प्राप्त होता है।
प्रदोष व्रत की पूजा के लिए सबसे पहले स्नान कर लेना चाहिए। फिर भगवान शंकर, पार्वती, नंदी, कार्तिकेय और भगवान गणपति को पंचामृत और गंगाजल से स्नान कराकर बेलपत्र, गंध, पुष्प, धूप-दीप, नैवेद्य, फल, पान, सुपारी, लौंग, ईलाईची समर्पित करना चाहिए। इसके अलावा शाम के समय भी स्नान्न के बाद इसी विधि के साथ प्रदोष व्रत का पूजन करना चाहिए। साथ ही भगवान शिव का षोडशोपचार पूजन करना चाहिए। फिर भगवान शिव को घी और शक्कर मिले हुए चूरमा का भोग लगाएं। साथ ही साथ संध्या काल में आठ दीपक जलाने होते हैं। इसके बाद भगवान शिव की आरती, स्तोत्र आदि करें। रात में जागरण करना भी प्रदोष व्रत का हिस्सा है इसलिए जागकर शिव की स्तुति करनी चाहिए। इस प्रकार प्रदोष व्रत की सावधानियों को ध्यान में रखकर शिव पूजन करना चाहिए।
