Dattatreya Jayanti, Puja Vidhi, Katha:  मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा के दिन दत्तात्रेय जयंती मनाई जाती है। इस बार यह तिथि 11 दिसंबर को पड़ रही है। भगवान दत्तात्रेय को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। तो वहीं कुछ मान्यताओं के अनुसार इन्हें भगवान शिव का स्वरूप माना गया है। कहा जाता है कि भगवान दत्तात्रेय अपने भक्तों के स्मरण मात्र से ही उनके पास पहुंच जाते हैं इसलिए इन्हें स्मृतिगामी भी कहा गया है।

मान्यताओं के अनुसार दत्तात्रेय जी ने 24 गुरुओं से शिक्षा प्राप्त की थी और इन्हीं के नाम पर ही दत्त समुदाय का उदय हुआ। दक्षिण भारत में इनका प्रसिद्ध मंदिर भी है। मान्यता है कि इस जयंती पर जो व्यक्ति व्रत रख इनकी विशेष पूजा अर्चना करता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि भगवान दत्तात्रेय ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों के एक स्वरूप हैं। इसलिए इनकी पूजा से त्रिदेव प्रसन्न हो जाते हैं।

भगवान दत्तात्रेय की पूजा विधि: भगवान दत्तात्रेय की उपासना करने के लिए घर के मंदिर या फिर किसी पवित्र स्थान पर इनकी प्रतिमा स्थापित करें। उन्हें पीले फूल और पीली चीजें अर्पित करें। इसके बाद इनके मन्त्रों का जाप करें। मंत्र इस प्रकार हैं ‘ॐ द्रां दत्तात्रेयाय स्वाहा’ दूसरा मंत्र ‘ॐ महानाथाय नमः’। मंत्रों के जाप के बाद भगवान से कामना की पूर्ति की प्रार्थना करें। हो सके तो इस दिन एक वेला तक उपवास या व्रत रखें।

भगवान दत्तात्रेय के जन्म की कथा: पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार तीन देवियों को अपने सतीत्व यानी पतिव्रता धर्म पर अभिमान हो गया। तब भगवान विष्णु ने लीला रची। तब नारद जी ने तीनों लोकों का भ्रमण करते हुए देवी सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती जी के समक्ष अनसूया के पतिव्रता धर्म की प्रशंसा कर दी। इस पर ईष्र्यावश तीनों देवियों ने अपने पतियों से अनसूया के पतिव्रता धर्म की परीक्षा लेने की हठ की।

तब त्रिदेव ब्राह्मण के वेश में महर्षि अत्रि के आश्रम पहुंचे, तब महर्षि अत्रि घर पर नहीं थे। तीन ब्राह्मणों को देखकर अनसूया उनके पास गईं। वे उन ब्राह्मणों का आदर—सत्कार करने के लिए आगे बढ़ी तब उन ब्राह्मणों ने कहा कि जब तक वे उनको अपनी गोद में बैठाकर भोजन नहीं कराएंगी, तब तक वे उनकी आतिथ्य स्वीकार नहीं करेंगे।

उनके इस शर्त से अनसूया चिंतित हो गईं। फिर उन्होंने अपने तपोबल से उन ब्राह्मणों की सत्यता जान गईं। भगवान विष्णु और अपने पति अत्रि को स्मरण करने के बाद उन्होंने कहा कि यदि उनका पतिव्रता धर्म सत्य है तो से तीनों ब्राह्मण 6 माह के शिशु बन जाएं। अनसूया ने अपने तपोबल से त्रिदेवों को शिशु बना दिया। शिशु बनते ही तीनों रोने लगे।

तब अनसूया ने उनको अपनी गोद में लेकर दुग्धपान कराया और उन तीनों को पालने में रख दिया। उधर तीनों दे​वियां अपने पतियों के वापस न आने से चिंतित हो गईं। तब नारद जी ने उनको सारा घटनाक्रम बताया। इसके पश्चात तीनों देवियों को अपने किए पर बहुत ही पश्चाताप हुआ। उन तीनों देवियों ने अनसूया से क्षमा मांगी और अपने पतियों को मूल स्वरूप में लाने का निवेदन किया।

तब अनसूया ने अपने तपोबल से उन तीन शिशुओं को फिर से उनके पूर्व के रूप में कर दिया। तब त्रिदेव ने उनसे वर मांगने को कहा, तब अनसूया ने उन तीन देवों को पुत्र स्वरूप में पाने का वर मांगा। त्रिदेव उनको वरदान देकर अपने धाम चले गए। बाद में माता अनसूया के गर्भ से भगवान विष्णु दत्तात्रेय, भगवान शिव दुर्वासा और ब्रह्मा चंद्रमा के रूप में जन्म लिए।

कहीं कहीं यह भी पढ़ने को मिलता है कि वर प्राप्त होने के बाद माता अनसूया के गर्भ से त्रिदेव के एकल स्वरूप में भगवान दत्तात्रेय प्रकट हुए, इसलिए कहा जाता है कि भगवान दत्तात्रेय की पूजा करने से त्रिदेवों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।