Chanakya Niti In Hindi: चाणक्य नीतिशास्त्र नीतियों के महान ज्ञाता और चंद्रगुप्त मौर्य के महामंत्री आचार्य चाणक्य का ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ का संस्कृत साहित्य में नीतिपरक ग्रन्थों में महत्वपूर्ण स्थान है। इसमें सूत्रात्मक शैली में जीवन को सुखमय और सफल बनाने के लिए नीतियां बताई गई हैं। जो मानव समाज के हर एक पहलू की व्यावहारिक शिक्षा देती हैं। जानिए चाणक्य नीति की कुछ अहम बातें…
कः कालः कानि मित्राणि को देशः कौ व्ययागमौ ।
कश्चाहं का च मे शक्तिरिति चिन्त्यं मुहुर्मुहुः ॥
अर्थ: इन बातों पर बार बार गौर करें…सही समय, सही मित्र, सही ठिकाना,
पैसे कमाने के सही साधन, पैसे खर्च करने के सही तरीके, आपके उर्जा स्रोत।
प्रलये भिन्नमर्यादा भवन्ति किल सागराः ।
सागरा भेदमिच्छन्ति प्रलयेऽपि न साधवः ॥ ०३-०६
अर्थ: जिस सागर को हम इतना गम्भीर समझते हैं, प्रलय आने पर वह भी अपनी मर्यादा भूल जाता है और किनारों को तोड़कर जल-थल एक कर देता है ; परन्तु साधु अथवा श्रेष्ठ व्यक्ति संकटों का पहाड़ टूटने पर भी श्रेष्ठ मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करता।
यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते
निघर्षणच्छेदनतापताडनैः।
तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते
त्यागेन शीलेन गुणेन कर्मणा॥ ०५-०२
अर्थ: जिस तरह सोने की परख घिसने से, तोडने से, गरम करने से और पीटने से होती है, वैसे ही मनुष्य की परख विद्या, शील, गुण और कर्म से होती है ।
दारिद्र्यनाशनं दानं शीलं दुर्गतिनाशनम्।
अज्ञाननाशिनी प्रज्ञा भावना भयनाशिनी॥ ०५-११
अर्थ: दान दरिद्रता को नष्ट कर देता है। शील स्वभाव से दुःखों का नाश होता है। बुद्धि अज्ञान को नष्ट कर देती है तथा भावना से भय का नाश हो जाता है।
जन्ममृत्यू हि यात्येको भुनक्त्येकः शुभाशुभम्।
नरकेषु पतत्येक एको याति परां गतिम्॥ ०५-१३
अर्थ: मनुष्य अकेला ही जन्म लेता है और अकेला ही मरता है। वह अकेला ही नर्क मे जाता है और अकेला ही परम पद को पाता है।
दातृत्वं प्रियवक्तृत्वं धीरत्वमुचितज्ञता ।
अभ्यासेन न लभ्यन्ते चत्वार: सहजा गुणा: ।। (Chanakya Niti Shloka ९०)
अर्थ: दान देने की इच्छा, मधुर वचन बोलना, सहनशीलता और उचित-अनुचित का ज्ञान- ये चार बातें मनुष्यों में सहज स्वभाव से ही होती है, इन्हें अभ्यास से प्राप्त नहीं किया जा सकता ।

