Shri Hit Premanand Govind Sharan Ji Maharaj: हिंदू धर्म में देवी-देवता की पूजा करने का विशेष महत्व है। अधिकतर घरों में भगवान की मूर्ति या फिर तस्वीरों को स्थापित है। सुबह के साथ-साथ शाम को विधिवत पूजा करते हैं। भगवान को जल, फूल, अक्षत, सिंदूर, भोग लगाने से लेकर आरती आदि करते हैं। देवी-देवता की पूजा के समय पूरे विधि-विधान का ध्यान रखते हैं। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि भगवान की मूर्ति या फिर पुरानी होने के कारण खराब या फिर टूट जाती है। इसके अलावा साफ-सफाई करते समय हाथ लग जाता है। ऐसे में प्रतिमा खंडित हो जाती है। ऐसे में हमारे दिमाग में कुछ अमंगल होने की शंका घर कर लेती है। इस बार को सोचने लगते हैं कि क्या भगवान की मूर्ति खंडित होना कोई अपशगुन का इशारा तो नहीं है। इस बारे में प्रेमानंद महाराज का एक वीडियो काफी वायरल हो रहा है। आइए जानते हैं खंडित मूर्ति को लेकर प्रेमानंद महाराज जी ने क्या कहा?
प्रेमानंद गोविंद शरण महाराज से एकांतिक वार्तालाप में एक व्यक्ति ने पूछा कि घर में भगवान जी का विग्रह स्वरूप गलती से टूट जाए तो इसका आध्यात्मिक अर्थ क्या है? इस सवाल का जवाब देते हुए महाराज जी ने कहा कि अगर घर में भगवान जी का विग्रह स्वरूप गलती से टूट जाए, तो इसका कोई अमंगल अर्थ नहीं होता।
प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि मूर्तियाँ पत्थर, धातु या मिट्टी से बनी होती हैं और ये सभी पदार्थ नाशवान हैं। इसलिए यदि मूर्ति गिरकर टूट जाए, तो चिंतित होने की आवश्यकता नहीं। ऐसी स्थिति में टूटी मूर्ति को पवित्र नदी जैसे गंगा या यमुना के किनारे मिट्टी में सम्मानपूर्वक समाधि देकर नई मूर्ति स्थापित कर लेनी चाहिए। पूजा का असली आधार मूर्ति नहीं, बल्कि भावना है। मूर्ति बदल सकती है, लेकिन भगवान अविनाशी हैं।
भगवान अविनाशी हैं मूर्ति नहीं
महाराज जी कहते हैं कि यदि मंदिर या घर में आग लग जाए या कोई आपदा आ जाए, तो मूर्ति भौतिक रूप से नष्ट हो सकती है, लेकिन भगवान नहीं। आग भी तो भगवान की ही शक्ति है। इसलिए आग में मूर्ति का नष्ट होना केवल “माया का नाश” है, भगवान का नहीं। जैसे शरीर जल सकता है, पर आत्मा नहीं। उसी प्रकार विग्रह नष्ट हो सकता है, पर भगवान उसकी सीमा में नहीं आते।
संसार परिवर्तनशील है इसीलिए मूर्तियां टूटती हैं
प्रेमानंद महाराज आगे कहते हैं कि यह जगत परिवर्तनशील है। जो भी भौतिक रूप है, वह समय पर नष्ट होना ही है। कई बार तारों की खराबी, पर्दों की आग या असावधानी से मंदिरों में मूर्तियां या सिंहासन जल जाते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि भगवान को कोई हानि पहुंची है। भगवान किसी भी स्थिति में अविनाशी ही रहते हैं। मूर्ति, पर्दे, भवन ये सब विनाशी हैं और समय आने पर परिवर्तन होना स्वाभाविक है।
भाव ही भगवान की असली प्रतिष्ठा है
मूर्ति में भगवान की उपस्थिति हमारी भावना के कारण होती है। मूर्ति तो पत्थर, धातु या रंग से बनी एक आकृति है, जिसे हमारा प्रेम दिव्यता प्रदान करता है। इसलिए यदि मूर्ति टूट जाए, तो दुखी होने की आवश्यकता नहीं। नई मूर्ति स्थापित कर प्रेम और श्रद्धा से पूजा जारी रखें। भगवान किसी मूर्ति तक सीमित नहीं हैं। वे हर कण, हर रूप और हर स्थिति में विद्यमान हैं। मूर्ति केवल उनकी स्मृति का माध्यम है, उनकी वास्तविक शक्ति नहीं। इसलिए मूर्ति का टूटना केवल बाहरी परिवर्तन है। भगवान का स्वरूप तो शाश्वत और अटूट है।
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