आषाढ़ सुदी नवरात्रि का तीसरा दिन 2 जुलाई, 2022 को है। तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। यहां हम आपको मां चंद्रघंटा की उत्पत्ति के बारे में बताने के साथ ही मां चंद्रघंटा की पूजा-विधि, भोग और आरती के बारे में भी बताने वाले है। चंद्रघंटा शब्द की उत्पत्ति चंद्र और घंटा से हुई है।

2 जुलाई, 2022 को आषाढ़ सुदी नवरात्रि का तीसरा दिन है। तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। आज हम मां चंद्रघंटा की उत्पत्ति के बारे में जानने के साथ ही पूजा-विधि, भोग और आरती के बारे में भी जानेंगे। आपको बता दें कि चंद्रघंटा शब्द की उत्पत्ति चंद्र और घंटा से हुई है। मां चंद्रघंटा के सिर पर एक घंटे के आकार का आधा चांद सुशोभित है। बाघ पर विराजमान मां चंद्रघंटा का मुख शांत, सात्विक, सौम्य लेकिन सूर्य के समान तेज है।

नवरात्रि के तीसरे दिन भक्त का मन मणिपुर चक्र में प्रवेश करता है। इस स्थिति में मां चंद्रघंटा की कृपा से भक्त अलौकिक और दिव्य चीजों को देखने में सक्षम होता है। और व्यक्ति विभिन्न प्रकार की दिव्य ध्वनियों को सुनने की क्षमता प्राप्त कर सकता है। लेकिन इस तीसरे दिन, और इस निश्चित स्थिति में भक्त को अत्यधिक अनुशासित और सावधान रहने की आवश्यकता है।

मां चंद्रघंटा की पूजा का शुभ मूहुर्त

अभिजीत मुहूर्त : दोपहर 12:19 से दोपहर 13:11 तक

इस मंत्र से करें देवी मां को प्रसन्न: ओम चं चं चं चंद्रघंटायेः हीं। इस मंत्र का 108 बार जाप करें। तीसरे दिन नीले रंग का वस्त्र धारण करें। साथ ही तीसरे दिन रेवड़ी, सफेद तिल और गुड़ का प्रसाद देवी मां को अर्पित करें।

मां चंद्रघंटा की आरती

जय मां चंद्रघंटा सुख धाम। पूर्ण कीजो मेरे सभी काम।
चंद्र समान तुम शीतल दाती।चंद्र तेज किरणों में समाती।
क्रोध को शांत करने वाली।मीठे बोल सिखाने वाली।
मन की मालक मन भाती हो। चंद्र घंटा तुम वरदाती हो।
सुंदर भाव को लाने वाली। हर संकट मे बचाने वाली।
हर बुधवार जो तुझे ध्याये।श्रद्धा सहित जो विनय सुनाएं।
मूर्ति चंद्र आकार बनाएं। सन्मुख घी की ज्योति जलाएं।
शीश झुका कहे मन की बाता। पूर्ण आस करो जगदाता।
कांचीपुर स्थान तुम्हारा। करनाटिका में मान तुम्हारा।
नाम तेरा रटूं महारानी। भक्त की रक्षा करो भवानी।