उन्नाव संसदीय सीट पर आजादी के बाद से अब तक 1952 से 1971 तक कांग्रेस का एकछत्र राज रहा है। 1952 में हुए पहले संसदीय चुनाव में उन्नाव के मतदाताओं ने विशम्भर दयालु त्रिपाठी को अपना सांसद चुना। वे दूसरे चुनाव में भी भारी बहुमत से जीतकर दिल्ली पहुंचे थे लेकिन दूसरे कार्यकाल में उनके देहावसान के बाद वर्ष 1960 में उन्नाव की जनता ने उपचुनाव में पार्टी प्रत्याशी रहे लीलाधर अस्थाना पर विश्वास जताया लेकिन 1962 के चुनाव में पार्टी प्रबंधन विशम्भर दयालु त्रिपाठी के पुत्र कृष्णदेव त्रिपाठी को प्रत्याशी बनाने से मतदाताओं ने उन्हें भी जिताकर लोकसभा में भेजा। वे 1967 के लोकसभा चुनाव में भी सांसद बने लेकिन बदली परिस्थितयों के कारण वर्ष 1971 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के चुनाव चिन्ह पर जियाउर्रहमान अंसारी जीतकर दिल्ली पहुंचे।
वर्ष 1977 में आपातकाल से नाराज मतदाताओं ने प्रजातांत्रिक व्यवस्था के 25 साल बाद कांग्रेस प्रत्याशी को पहली बार छोड़कर जनता पार्टी के उम्मीदवार चौ राघवेद्र सिंह को जिताया। हालांकि 1980 में हुए मध्यावधि चुनाव में जिले के मतदाताओं ने फिर कांग्रेस पर भरोसा जताकर जेडआर अंसारी को वर्ष 1984 में जिताया। 1989 में जनता दल के उम्मीदवार अनवार अहमद जीते। वर्ष 1991 में अयोध्या जन्म भूमि का मामला गरमाने से उन्नाव में भाजपा उम्मीदवार देवीबक्स सिंह चुनाव जीते। वे वर्ष 1996 तथा 1998 में (तीन बार) सांसद बने। उनकी हैट्रिक को समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार सदर विधायक दीपक कुमार ने तोड़ने का काम किया। वर्ष 2004 में बसपा के ब्रजेश पाठक जीते। 2009 में कांग्रेस की अन्नू टण्डन उन्हें हराकर सांसद बनीं। कुल मिलाकर कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार बार सांसद बने।
उन्नाव से सिर्फ एक बार बनीं महिला सांसद: उन्नाव से सिर्फ वर्ष 2009 में महिला सांसद के रूप में कांग्रेस की अन्नू टण्डन को देश की सबसे बडी पंचायत में पहुंचने का मौका मिला। यह बात अलग है कि वर्ष 1996 में तिवारी कांग्रेस की टिकट पर देश के पूर्व गृहमंत्री उमाशंकर दीक्षित की बहू शीला दीक्षित ने जनपद की नगर पंचायत ऊगू में अपनी ससुराल होने के कारण लोकसभा चुनाव लड़ा लेकिन उन्हें मात्र 11037 मत पाकर ही संतोष करना पड़ा। मौजूदा सांसद: वर्ष 2014 में भाजपा के साक्षी महाराज ने सपा के अरुण शंकर शुक्ल को 3 लाख 10 हजार 173 मतों से हराकर जीत पाई।

