सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को निर्देश दिया है कि वह उस गरीब महिला को 10 लाख रुपए का मुआवजा दे, जिसके साथ कथित तौर पर बलात्कार हुआ था और जिसे चिकित्सीय बोर्ड की राय के बाद उसके 26 हफ्ते के गर्भ को गिराने की अनुमति नहीं दी गई थी। न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा के पीठ ने कहा कि उसने कुछ निर्देश जारी किए हैं। साथ ही पटना हाईकोर्ट के उस आदेश को दरकिनार कर दिया है, जिसके तहत महिला को गर्भ गिराने की अनुमति इसलिए नहीं दी गई थी क्योंकि वह 20 हफ्ते के गर्भ की कानूनी सीमा को पार कर चुकी है। यह सीमा चिकित्सीय गर्भपात कानून, 1971 में दी गई है।
पीड़िता के वकील ने शीर्ष अदालत को बताया था कि महिला को बिहार सरकार से मुआवजा मिलना चाहिए क्योंकि वह गर्भ गिरवाने के लिए पटना मेडिकल कॉलेज और अस्पताल गई थी। उस समय उसके गर्भ का 17वां हफ्ता चल रहा था। अदालत यहां 35 वर्षीय एचआइवी पॉजिटिव गरीब महिला के मामले की सुनवाई कर रही थी। महिला के साथ पटना की सड़कों पर कथित तौर पर बलात्कार किया गया और अब वह 26 हफ्ते की गर्भवती है। एम्स के चिकित्सीय बोर्ड से शीर्ष अदालत ने महिला की जांच करने के लिए कहा था। बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि वह अपनी गर्भावस्था के काफी आगे के चरण में है। शीर्ष अदालत ने पहले कहा था कि वह हाईकोर्ट के इस आदेश की समीक्षा नहीं करेगी, जिसमें कहा गया था कि मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, यह याचिकाकर्ता के जीवन के लिए खतरा होगा और बच्चे को जिंदा रखना सरकार की जिम्मेदारी है।
महिला ने अपनी याचिका में कहा है कि वह गरीब है और उसे अपनी गर्भावस्था के बारे में पहली बार तब पता लगा जब उसे 13वां हफ्ता चल रहा था। उसे यह तब पता लगा जब एक महिला पुनर्वास केंद्र शांति कुटीर ने उसे बचाया और 26 जनवरी को उसका गर्भ परीक्षण कराया गया। महिला ने कहा है कि उसने टाटा इंस्टीट्यूट आॅफ सोशल साइंसेज के फील्ड एक्शन प्रोजेक्ट कोशिश में शोध अधिकारी से 4 मार्च को अपना गर्भ गिरवाने की इच्छा जाहिर की थी। इसके बाद ही उसने आश्रय गृह के अधीक्षक को बताया कि गर्भावस्था बलात्कार का नतीजा है। उसने 14 मार्च को अस्पताल में गर्भ गिरवाने की कोशिशें कीं। याचिका में कहा गया कि अस्पताल ने पहचानपत्र न होने पर महिला को भर्ती करने से इनकार कर दिया।

