सुप्रीम कोर्ट ने भीड़ की हिंसा और लोगों को पीट पीटकर मारने की घटनाओं के लिए सीधे तौर पर केंद्र और राज्य सरकारों को जवाबदेह बनाया है। अदालत ने मंगलवार को कहा कि सोशल मीडिया पर गैरकानूनी और विस्फोटक संदेशों व वीडियो के प्रचार-प्रसार पर अंकुश पाने और रोकने के लिए सरकार जल्द कदम उठाए। क्योंकि ये भीड़तंत्र को बढ़ावा देते हैं और ऐसी घटनाओं के लिए प्रेरित करते हैं। शीर्ष अदालत ने महात्मा गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी और तहसीन पूनावाला जैसे लोगों की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया। इन याचिकाओं में ऐसी हिंसक घटनाओं पर अंकुश पाने के लिए दिशा निर्देश बनाने का अनुरोध किया गया है। याचिकाओं पर अदालत ने ऐसी घटनाओं की रोकथाम, उपचार और दंडात्मक उपायों का प्रावधान करने के लिए अनेक निर्देश दिए। अदालत ने राज्य सरकारों से कहा कि वे प्रत्येक जिले में पुलिस अधीक्षक स्तर के वरिष्ठ अधिकारियों को नोडल अधिकारी मनोनीत करें। अदालत ने कहा कि भीड़ की हिंसा और लोगों को पीट पीटकर मारने की घटनाओं की रोकथाम के उचित कदम उठाने के लिए नोडल अधिकारियों की मदद हेतु उपाधीक्षक रैंक का एक अधिकारी रहना चाहिए। वे एक विशेष कार्य बल बनाएंगे ताकि ऐसे अपराध करने की आशंका वाले और नफरत फैलाने वाले भाषण, भड़काने वाले बयान व फर्जी खबरों में लिप्त लोगों के बारे में गुप्तचर सूचनाएं प्राप्त की जाए।
प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और न्यायमूर्ति धनंजय वाई चंद्रचूड़ के पीठ ने कहा कि राज्य तत्काल ऐसे जिलों, उपमंडलों और गांवों की पहचान करेंगे जहां पिछले कम से कम पांच साल में पीट पीटकर मारने और भीड़ की हिंसा की घटनाएं हुई हैं। इस तरह की पहचान की प्रक्रिया फैसले की तारीख से तीन हफ्ते के भीतर पूरी होनी चाहिए। अदालत ने कहा कि त्वरित आंकड़े एकत्र करने के आज के दौर में यह काम पूरा करने के लिए यह समय पर्याप्त है। अदालत ने अपने 45 पेज के फैसले में कहा कि संबंधित राज्यों के गृह विभाग के सचिव संबंधित जिलों के नोडल अधिकारियों के लिए निर्देश और परामर्श जारी करके यह सुनिश्चित करेंगे कि पहचाने गए इलाकों के थानों के प्रभारी अतिरिक्त सावधानी बरतें यदि उनके अधिकार क्षेत्र में भीड़ की हिंसा की किसी घटना के बारे में उन्हें जानकारी मिलती है। पीठ ने कहा कि नोडल अधिकारी को सभी थाना प्रभारियों के साथ महीने में कम से कम एक बार जिले की स्थानीय खुफिया इकाई के साथ बैठक करनी चाहिए। अदालत ने कहा कि प्रत्येक पुलिस अधिकारी का यह कर्तव्य है कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 129 में प्रदत्त अधिकार का इस्तेमाल करके भीड़ को तितर बितर करे जिसमें गो रक्षा जैसे किसी भी मुद्दे की आड़ में लोगों को पीट पीटकर मारने की प्रवृत्ति हो। पुलिस महानिदेशक पिछली घटनाओं के मद्देनजर संवेदनशील इलाकों में पुलिस की गश्त और महानिदेशक कार्यालय को मिली गोपनीय जानकारियों के बारे में पुलिस अधीक्षकों को परिपत्र जारी करेंगे।
पीठ ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों को रेडियो, टेलीविजन और दूसरे मीडिया मंचों, गृह मंत्रालय और पुलिस की वेबसाइट पर यह प्रसारित करना चाहिए कि पीट पीटकर मारने और भीड़ की किसी भी प्रकार की हिंसा की स्थिति में कानून के तहत गंभीर परिणाम होंगे। पीठ ने यह भी कहा कि यदि कोई पुलिस अधिकारी या जिला प्रशासन का अधिकारी इन निर्देशों का पालन करने में असफल रहता है तो इसे जानबूझ कर लापरवाही करने और कदाचार का कृत्य माना जाएगा। इसके लिए उचित कार्रवाई की जानी चाहिए। विभागीय कार्रवाई को छह महीने के भीतर निष्कर्ष तक पहुंचाना होगा। अदालत ने कहा कि विधि सम्मत शासन सुनिश्चित करते हुए समाज में कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्यों का काम है और नागरिक कानून को अपने हाथ में नहीं ले सकते। वे अपने आप में कानून नहीं बन सकते। भीड़तंत्र की इन भयावह गतिविधियों को नया चलन नहीं बनने दिया जा सकता। राज्य ऐसी घटनाओं को नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं। पीठ ने विधायिका से कहा कि भीड़ की हिंसा के अपराधों से निबटने के लिए नए दंडात्मक प्रावधानों वाला कानून बनाने और ऐसे अपराधियों के लिए इसमें कठोर सजा का प्रावधान करने पर विचार करना चाहिए। अदालत ने अब इन जनहित याचिकाओं को आगे विचार के लिए 28 अगस्त को सूचीबद्ध किया है। साथ ही केंद्र व राज्य सरकारों से कहा है कि इसके निर्देशों के आलोक में ऐसे अपराधों से निबटने के लिए कदम उठाए जाएं।
रोकथाम, उपचार और दंडात्मक उपायों के लिए कोर्ट के निर्देश
– नोडल अधिकारी मनोनीत करें
– राज्य सरकार प्रत्येक जिले में पुलिस अधीक्षक स्तर के वरिष्ठ अधिकारियों को नोडल अधिकारी मनोनीत करें।
– इनकी मदद के लिए उपाधीक्षक रैंक के एक अधिकारी होंगे जो विशेष कार्य बल बनाएंगे।
– यह बल नफरत फैलाने वाले भाषण, भड़काने वाले बयान व फर्जी खबरों में लिप्त लोगों के बारे में गुप्तचर सूचनाएं प्राप्त करेगा।
तीन हफ्ते में काम पूरा हो
– राज्य ऐसे जिलों, उपमंडलों और गांवों की पहचान करेंगे जहां पिछले पांच साल में ऐसी घटनाएं हुई हैं। तीन हफ्ते के भीतर यह काम पूरा हो जाना चाहिए।
– राज्यों के गृह विभाग के सचिव जिलों के नोडल अधिकारियों के लिए निर्देश और परामर्श जारी करेें। नोडल अधिकारी सभी थाना प्रभारियों के साथ महीने में कम से कम एक बार जिले की स्थानीय खुफिया इकाई के साथ बैठक करेंगे।
जागरूक करें
– केंद्र और राज्य सरकार रेडियो, टेलीविजन और दूसरे मीडिया मंचों, गृह मंत्रालय और पुलिस की वेबसाइट पर यह प्रसारित करें कि ऐसी घटनाओं के गंभीर परिणाम होंगे।
– यदि पुलिस या जिला प्रशासन का अधिकारी इन निर्देशों का पालन करने में असफल रहता है तो उसके खिलाफ उचित कार्रवाई हो। विभागीय कार्रवाई को छह महीने के भीतर निष्कर्ष तक पहुंचाना होगा।

