दिल्ली में डीटीसी की हरी और लाल बसें पीछे चल रहे दुपहिया, रिक्शा, साइकिल आदि के चालकों के मुंह पर सीधे गर्म धुआं फेंकती हैं। मैंने जनहित में व्यावहारिक सलाह दी कि इन बसों में लगे धुएं के पाइप को कुछ मोड़ दिया जाए ताकि धुआं ऊपर-नीचे या दाएं-बाएं जा सके। इस बाबत राष्ट्रपति को लिखा तो वहां से मेरे पत्र डीटीसी को भेज दिए गए। डीटीसी ने अपनी विभिन्न मजबूरियां बता दीं। मैंने हिम्मत कर राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) को लिखा। वहां से जवाब आया कि इस सूचना को मुकदमा बना कर, छह फाइलों में फीस के ड्राफ्ट के साथ खुद जमा कराओ। यह सब भी किया लेकिन मेरी कई पेशियों के बाद एनजीटी ने कहा, सरकार के पास जाओ। आज भी डीटीसी खुलेआम जनता की आंखों में लगातार धुआं फेंक कर दादागीरी कर रही है। यह मामला मंत्रालय को देखना चाहिए लेकिन आम आदमी की किसे परवाह है!
’जीवन मित्तल, मोती नगर, नई दिल्ली
मुंह पर धुआं
दिल्ली में डीटीसी की हरी और लाल बसें पीछे चल रहे दुपहिया, रिक्शा, साइकिल आदि के चालकों के मुंह पर सीधे गर्म धुआं फेंकती हैं।
Written by जनसत्ता

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First published on: 29-11-2016 at 05:48 IST