हाजी अली दरगाह के मुख्य हिस्से में जाने को लेकर महिलाओं पर लगी रोक को बंबई हाई कोर्ट द्वारा हटाए जाने के ऐतिहासिक फैसले और दरगाह कमेटी की ओर से इसका विरोध किए जाने की पृष्ठभूमि में देश के कुछ प्रमुख इस्लामी विद्वानों ने अदालत के फैसले की तारीफ करते हुए कहा कि मुसलिम महिलाओं को इबादत में मजहबी तौर पर पूरी बराबरी का हक हासिल है। यह अदालती आदेश किसी भी तरह से शरिया मामलों में दखल नहीं है।
हाई कोर्ट ने बीते शुक्रवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए हाजी अली दरगाह के मुख्य हिस्सों में महिलाओं के प्रवेश पर लगा प्रतिबंध हटा लिया। अदालत ने कहा कि यह रोक संवैधानिक अधिकारों का हनन है और ट्रस्ट को सार्वजनिक इबादत स्थल में महिलाओं के प्रवेश को रोकने का अधिकार नहीं है। बंबई हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति वीएम कानाडे और न्यायमूर्ति रेवती मोहिते डेरे ने शुक्रवार को फैसले में कहा, ‘हम कहते हैं कि दरगाह ट्रस्ट द्वारा हाजी अली दरगाह के मजार के हिस्से में महिलाओं के प्रवेश को रोकना संविधान के अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 25 का उल्लंघन है। महिलाओं को पुरुषों की तरह ही मजार के हिस्से में प्रवेश की इजाजत होनी चाहिए।’ इन अनुच्छेदों के तहत किसी व्यक्ति को कोई भी धर्म मानने, उसका आचरण और प्रचार करने का मौलिक अधिकार है। ये धर्म, लिंग और अन्य आधार पर भेदभाव पर रोक भी लगाते हैं। हाजी अली दरगाह ट्रस्ट का दावा है कि दरगाह के मुख्य हिस्से में महिलाओं के जाने पर रोक शरिया कानून के तहत लगाई गई थी और वह इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगा।
फतेहपुरी मस्जिद के शाही इमाम मुफ्ती मुकर्रम अहमद का कहना है, ‘जब जन्नतुल बकी (मदीना स्थित कब्रिस्तान) में महिलाओं के जाने पर पाबंदी नहीं है तो दरगाहों के भीतर कैसे हो सकती है। आखिरकार दरगाह भी कब्र होती है। मुझे नहीं लगता है कि अदालत के इस फैसले पर बवाल मचाने की कोई जरूरत है। इस फैसले को शरीयत पर हमला बताना भी गलत है। मैं इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने के भी खिलाफ हूं।’ जामिया मिलिया इस्लामिया में इस्लामी अध्ययन विभाग के प्रोफेसर जुनैद हारिश ने कहा, ‘इस्लाम में मुसलिम महिलाओं को इबादत को लेकर पूरी तरह से बराबरी का हक हासिल है। उनको मसजिदों और दूसरे धार्मिक स्थलों पर जाने की पूरी आजादी है। अगर कोई यह कहता है कि किसी धार्मिक स्थल पर महिलाओं के जाने पर रोक होनी चाहिए तो इस्लामी नजरिए से यह गलत है।’
जानी-मानी इस्लामिक नारीवादी शीबा असलम फहमी ने कहा, ‘इस फैसले का स्वागत होना चाहिए। अदालत ने पुरुषवादी मानसिकता रखने वालों के मुंह पर ताला लगा दिया है जो महिलाओं को पीछे रखना चाहते हैं। इस्लाम के कुछ तथाकथित ठेकेदार शरिया को मनगढ़ंत ढंग से पेश करते हैं। यह फैसला इन्हीं लोगों के खिलाफ जीत है।’ शीबा असलम फहमी कहती हैं, ‘दरगाह और कुछ धार्मिक स्थलों को लोग जिस तरह से चला रहे हैं, उसको लेकर भी गंभीर सवाल खड़े होते हैं। कुछ लोग इन स्थलों पर अपना कब्जा रखना चाहते हैं और इन्हीं लोगों ने मनगढ़ंत नियम बना रखे हैंं।’ इस्लामी जानकार और स्तंभकार गुलाम रसूल देहलवी भी इस फैसले की तारीफ करते हुए कहते हैं, ‘पैगम्बर मुहम्मद ने खुद इबादत और जियारत को लेकर बराबरी के हक की बात की थी। दरगाह ट्रस्ट के लोग जो दलीलें दे रहे हैं, उनमें कोई दम नहीं है। मेरा मानना है कि किसी भी इबादतगाह या दरगाह पर किसी महिला को जाने से रोकना उचित नहीं है।’

